Saturday, September 18, 2010

Arya Samaj - अहिंसा परमो धर्मः ?

‘योग सूत्र’ के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंगों का वर्णन किया है। योग का पहला अंग ‘यम’ है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच को योग दर्शन में ‘यम’ कहा गया है।

‘अहिंसा सत्या स्तेय ब्रह्मचर्या परिग्रहा यमाः। (योग दर्शन, 2-30)


जैन मत में उक्त पाँचों को व्रत कहा गया है। अहिंसा जैन मत का मुख्य तत्व है। यहाँ अहिंसा का मतलब किसी प्राणी को बिना किसी उद्देश्य के नुकसान न पहुंचाना है। निष्प्रयोजन किसी प्राणी की हत्या करना या चोट पहुंचाना यहाँ तक कि क्लेश पहुंचाना एवं आत्मभाव पर आघात करना हिंसा है। निष्प्रयोजन किसी पेड़ की टहनियाँ तोड़ना भी हिंसा के अन्तर्गत आता है। मगर कुछ पंथों के प्रणेताओं ने हिंसा की मनमानी व्याख्या की है। ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’ का नारा देने वालों का कहना है कि किसी भी प्रकार की हिंसा पाप है चाहे वह प्रयोजनीय हो या निष्प्रयोजनीय। उक्त नारे का मूल निहितार्थ मांस भक्षण को निषिद्ध व पाप ठहराना था। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी के बाद महात्मा बुद्ध ने भी अहिंसा का उपदेश दिया।

गौतम बुद्ध का जन्म एक क्षत्रिय परिवार में 563 ई0पू0 लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। लुम्बिनी कपिलवस्तु के पड़ोस में है। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ श्रेष्ठतर जीवन मूल्यों की तलाश में 29 वर्ष की आयु में घर से निकल गए। 6 वर्ष तक सच्चाई की तलाश में भटकते हुए एक दिन उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गए। गौतम बुद्ध के बाद भारतीय चिंतन में एक तूफ़ान-सा आ गया था, क्योंकि गौतम बुद्ध का सीधा टकराव वैदिक ब्राह्मणों से था।


वैदिक ब्राह्मण यज्ञ को प्रथम और उत्तम वैदिक संस्कार समझते थे। यह आर्यों का मुख्य धार्मिक कृत्य था। पशु बलि यज्ञ का मुख्य अंग थी। पशु बलि को बहुत ही पुण्य का कर्तव्य समझा जाता था। गौतम बुद्ध ने जब देखा कि आर्य लोग यज्ञ में निरीह पशुओं की बलि चढ़ाते हैं, तो यह देखकर उनका हृदय विद्रोह से भर उठा। आर्य धर्म के विरूद्ध उठने वाली क्रांति का प्रमुख कारण वैदिक पुरोहितवाद और हिंसा पूर्ण कर्मकांड ही था। 
 ईसा से करीब 500 वर्ष पहले गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया था वह यह था कि, 
‘‘पशु बलि का पुण्य कार्य और पापों के प्रायश्चित से क्या संबंध ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है ?’’
यह एक विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध के करीब 2350 वर्ष बाद आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के प्रकांड पंडित स्वामी दयानंद सरस्वती ने इस्लाम पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया है वह यह है कि 
‘‘यदि अल्लाह प्राणी मात्र के लिए दया रखता है तो पशु बलि का विधान क्यों कर धर्म-सम्मत हो सकता है ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है।’’ 
कैसी अजीब विडंबना है कि जो सवाल गौतम बुद्ध ने वैदिक ऋषियों से किया था, वही सवाल करीब 2350 वर्ष बाद एक वैदिक महर्षि मुसलमानों से करता है। जो आरोप गौतम बुद्ध ने आर्य धर्म पर लगाया था, वही आरोप कई ‘शताब्दियों बाद एक आर्य विद्वान इस्लाम पर लगाता है।

धर्म का संपादन मनुष्य द्वारा नहीं होता। धर्म सृष्टिकर्ता का विधान होता है। धर्म का मूल स्रोत आदमी नहीं, यह अति प्राकृतिक सत्ता है। यह भी विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व का इंकार करके वैदिक धर्म को आरोपित किया था, मगर स्वामी दयानंद सरस्वती ने ईश्वर के अस्तित्व का इकरार करके इस्लाम को आरोपित किया है। 

प्राचीन भारतीय समाज में पशु बलि के साथ-साथ नर बलि की भी एक सामान्य प्रक्रिया थी। यज्ञ-याग का समर्थन करने वाले वैदिक ग्रंथ इस बात के साक्षी हैं कि न केवल पशु बलि बल्कि नर बलि की प्रथा भी एक ठोस इतिहास का परिच्छेद है। यज्ञों में आदमियों, घोड़ों, बैलों, मेंढ़ों और बकरियों की बलि दी जाती थी। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मुख्य पुस्तक ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में लिखा है कि यज्ञ का सार पहले मनुष्य में था, फिर वह अश्व में चला गया, फिर गो में, फिर भेड़ में, फिर अजा में, इसके बाद यज्ञ में प्रतीकात्मक रूप में नारियल-चावल, जौ आदि का प्रयोग होने लगा। आज भी हिंदुओं के कुछ संप्रदाय पशु बलि में विश्वास रखते हैं। 


वेदों के बाद अगर हम रामायण काल की बात करें तो यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि श्री राम शिकार खेलते थे। जब रावण द्वारा सीता का हरण किया गया, उस समय श्री राम हिरन का शिकार खेलने गए हुए थे। उक्त तथ्य के साथ इस तथ्य में भी कोई विवाद नहीं है कि श्रीमद्भागवतगीता के उपदेशक श्री कृष्ण की मृत्यु शिकार खेलते हुए हुई थी। यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि क्या उक्त दोनों महापुरुष हिंसा की परिभाषा नहीं जानते थे ? क्या उनकी धारणाओं में जीव हत्या जघन्य पाप व अपराध नहीं थी ? क्या शिकार खेलना उनका मन बहलावा मात्र था ?

अगर हम उक्त सवाल पर विचार करते हुए यह मान लें कि पशु बलि और मांस भक्षण का विधान धर्मसम्मत नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्‍वर अत्यंत दयालु और कृपालु है, तो फिर यहाँ यह सवाल भी पैदा हो जाता है कि जानवर, पशु, पक्षी आदि जीव हत्या और मांस भक्षण क्यों करते हैं। अगर अल्लाह की दयालुता का प्रमाण यही है कि वह जीव हत्या और मांस भक्षण की इजाजत कभी नहीं दे सकता तो फिर शेर, बगुला, चमगादड़, छिपकली, मकड़ी, चींटी आदि जीवहत्या कर मांस क्यों खाते हैं ? क्या शेर, चमगादड़ आदि ईश्वर की रचना नहीं है ?


शेर को जंगल का राजा कहा जाता है, वह जानवरों पर इतनी बेदर्दी और बेरहमी से हमला करता है कि जानवर दहाड़ मारने लगता है। मांसाहारी चमगादड़ों की एक बस्ती में लगभग 2 करोड़ तक चमगादड़ें होती हैं। अगर चमगादड़ की एक बस्ती के एक रात के भोजन का अनुमान लगाये तो 2 करोड़ की एक बस्ती एक रात में करीब 2500 कुंतल कीड़ों, कीटों आदि को चट कर जाती हैं। अगर इन कीड़ों, कीटों की तादाद का अनुमान लगाया जाए तो यह तादाद करीब 1000 करोड़ से अधिक होती है। यह तो एक मामूली-सा उदाहरण मात्र है, यह दुनिया बहुत बड़ी है और इस जमीनी दुनिया से कहीं अधिक विस्तृत और विशाल तो समुद्री दुनिया है जहाँ एक जीव पूर्ण रूप से दूसरे जीव पर निर्भर है।

विश्व के मांस संबंधी आंकड़ों पर अगर हम एक सरसरी नज़र डालें तो आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन 8 करोड़ मुर्गियां, 22 लाख सुअर, 13 लाख भेड़-बकरियां, 7 लाख गाय, करोड़ों मछलियां और अन्य पशु-पक्षी मनुष्य का लुकमा बन जाते हैं। कई देश तो ऐसे हैं जो पूर्ण रूप से मांस पर ही निर्भर हैं। अब अगर मांस भक्षण को पाप व अपराध मान लिया जाए तो न केवल मनुष्य का जीवन बल्कि सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जीव-हत्या को पाप मानकर तो हम खेती-बाड़ी का काम भी नहीं कर सकते, क्योंकि खेत जोतने और काटने में तो बहुत अधिक जीव-हत्या होती है।


विज्ञान के अनुसार पशु-पक्षियों की भांति पेड़-पौधों में भी जीवन Life है। अब जो लोग मांस भक्षण को पाप समझते हैं, क्या उनको इतनी-सी बात समझ में नहीं आती कि जब पेड़-पौधों में भी जीवन है तो फिर उनका भक्षण जीव-हत्या क्यों नहीं है? फिर मांस खाने और वनस्पति खाने में अंतर ही क्या है ? यहाँ अगर जीवन Life ; और जीव Soul; में भेद न माना जाए तो फिर मनुष्य भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की श्रेणी में आ जाता है। जीव केवल मनुष्य में है इसलिए ही वह अन्यों से भिन्न और उत्तम है।

विज्ञान के अनुसार मनुष्य के एक बार के वीर्य Male generation fluid स्राव (Discharge) में 2 करोड़ ‘शुक्राणुओं (Sperm) की हत्या होती है। मनुष्य जीवन में एक बार नहीं, बल्कि सैकड़ों बार वीर्य स्राव करता है। फिर मनुष्य भी एक नहीं करोड़ों हैं। अब अगर यह मान लिया जाए कि प्रत्येक ‘शुक्राणु (Sperm) एक जीव है, तो इससे बड़ी तादाद में जीव हत्या और कहां हो सकती है ? करोड़ों-अरबों जीव-हत्या करके एक बच्चा पैदा होता है। अब क्या जीव-हत्या और ‘‘अहिंसा परमों धर्मः’’ की धारणा तार्किक और विज्ञान सम्मत हो सकती है।


 जहाँ-जहाँ जीवन है वहाँ-वहाँ जीव (Soul) हो यह ज़रूरी नहीं। वृद्धि- ह्रास , विकास जीवन (Life) के लक्षण हैं जीव के नहीं। आत्मा वहीं है जहाँ कर्म भोग है और कर्म भोग वही हैं जहाँ विवेक (Wisdom) है। पशु आदि में विवेक नहीं है, अतः वहां आत्मा नहीं है। आत्मा नहीं है तो कर्म फल भोग भी नहीं है। आत्मा एक व्यक्तिगत अस्तित्व (Cosmic Existence) है जबकि जीवन एक विश्वगत अस्तित्व (Individual Existence) है। पशु और वनस्पतियों में कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं होता। अतः उसकी हत्या को जीव हत्या नहीं कहा जा सकता। जब पशु आदि में जीव (Soul) ही नहीं है, तो जीव-हत्या कैसी ? पशु आदि में सिर्फ और सिर्फ जीवन है, जीव नहीं। अतः पशु-पक्षी आदि के प्रयोजन हेतु उपयोग को हिंसा नहीं कहा जा सकता।

Friday, September 17, 2010

Arya Samaj - ख़तना और पेशाब

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता ने लिखा है कि अगर ख़तना कराना ईश्वर को इष्ट होता तो वह ईश्वर उस चमड़े को आदि सृष्टि में बनाता ही क्यों ? और जो बनाया है वह रक्षार्थ है जैसा आँख के ऊपर चमड़ा। वह गुप्त स्थान अति कोमल है जो उस पर चमड़ा न हो तो एक चींटी के काटने और थोड़ी चोट लगने से बहुत सा दुःख होवे और लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रांश कपड़ों में न लगे आदि बातों के लिए ख़तना करना बुरा है। ईसा की गवाही मिथ्या है, इसका सोच-विचार ईसाई कुछ भी नहीं करते। (13-31)

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के लेखक का यह कहना कि अगर ख़तना कराना ईश्वर को पसंद होता तो वह चमड़ा ऊपर लगाता ही क्यों? यह कोई बौद्धिक तर्क नहीं है? सृष्टिकर्ता ने मनुष्य को नंगा पैदा किया है, इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि मनुष्य कपड़े ना पहने, नंगा ही जिये, नंगा ही मरे, गंदा पैदा होता है, गंदा ही रहे। नाखून और बाल आदि भी न कटवाए। दूसरी बात यह कि सृष्टिकर्ता ने चींटी व चोट आदि से सुरक्षा हेतु झिल्ली की व्यवस्था की है। जिस चमड़ी की व्यवस्था सृष्टिकर्ता ने की है वह चमड़ी या झिल्ली न चींटीं रोधक है और न ही चोट रोधक। वह झिल्ली स्वयं इतनी अधिक कोमल है कि उसे खुद सुरक्षा की आवश्यकता है। तीसरी बात कि लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रांश कपड़ों पर न लगे इसलिए झिल्ली की व्यवस्था की गई है। झिल्ली में कोई सोखता तो लगा नहीं कि वह मूत्रांश को अपने अंदर सोख लेगा। झिल्ली होने से तो और अधिक मूत्रांश झिल्ली में रूकेगा और कपड़ों को गीला और गंदा करेगा। यह तो एक साधारण सी बात है इसमें किसी शोध की भी आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक पेशाब की बात है पेशाब शरीर की गंदगी है, इसे धोया जाए तो नुकसान ही क्या है? मगर लेखक ने पेशाब धोने की बात कहीं नहीं लिखी है, जबकि हिंदू ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। एक उदाहरण देखिए -
एका लिंगे गुदे तिस्रस्तथैकत्र करे दश ।
उभयोः सप्त दातव्याः मृदः शुद्धिमभीप्सता ।।
(मनु, 5-139)
भावार्थ - शुद्धि के इच्छुक व्यक्ति को मूत्र करने के उपरांत लिंग पर एक बार जल डालना चाहिए । मलत्याग के उपरांत गुदा पर तीन बार मिट्टी मलकर दस बार जल डालना चाहिए और जिस बायें हाथ से गुदा पर मिट्टी मली है व जल से उसे धोया है, उस पर दस बार जल डालते हुए दोनों हाथों पर सात बार मिट्टी मलकर उन्हें जल से अच्छी प्रकार धोना चाहिए ।

यहाँ यह भी विचारणीय है कि लेखक ने अपनी समीक्षा में केवल ईसा मसीह और ईसाइयों का ही उल्लेख किया है जबकि ख़तना तो यहूदी और मुसलमान भी कराते हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों ने शोध कर दावा किया है कि ख़तना कराने वाले लोगों में एच.आई.वी. संक्रमण होने के आसार अन्य लोगों की तुलना में छः गुना कम होते हैं। एक विज्ञान की पत्रिका में यह भी बताया गया है कि पुरुषों की जनेन्द्रिय की पतली चमड़ी पर एच.आई.वी. संक्रमण ज्यादा कारगर तरीके से हमला करता है। ख़तना कराकर अगर चमड़ी को हटा दिया जाए तो संक्रमण का ख़तरा कम हो जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ख़तने के द्वारा एच.आई.वी. संक्रमण से बचाव हो सकता है, क्योंकि लिंग की बाहरी पतली झिल्ली एच.आई.वी. के लिए आसान शिकार है। ख़तना जनेन्द्रिय की झिल्ली के अन्दर जमा होने वाले पसेव (गंदगी) से तो बचाता ही है साथ ही पुरुष के पुरुषत्व को भी बढ़ाता है। इसका मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ख़तना के एड्स जैसी अन्य ख़तरनाक बीमारियों से बचाव के दूरगामी लाभ भी हो सकते हैं जो अभी मनुष्य की आंखों से ओझल हैं।
...........................
x000xx000xx000x

खतने से घटता है सर्वाइकल कैंसर का खतरा

वाशिंगटन। हर परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण होता है। मुस्लिमों में बचपन में की जाने वाली खतना की रस्म [जननांग की ऊपरी चमड़ी को निकालना] को कई दुसाध्य बीमारियों से निपटने में बेहद कारगर बताया गया है। हाल में हुए एक शोध के मुताबिक खतना से एड्स व यौन संचारित वायरस के चलते होने वाले सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम में मदद मिलती है।
शोध में नवजात शिशुओं का खतना किए जाने से उन्हें भविष्य में यौन संचारित रोगों से बचाव की बात कही गई है। वर्साय यूनिवर्सिटी [फ्रांस] के डा. बेर्टन आवर्ट और उनके दक्षिण अफ्रीकी सहयोगियों ने अध्ययन के दौरान करीब 1200 पुरुषों का परीक्षण किया। अध्ययन में खतना वाले 15 फीसदी व बिना खतना वाले 22 फीसदी पुरुषों को ह्यूंमन पैपीलोमा वायरस [एचपीवी] से संक्रमित पाया गया। सर्वाइकल कैंसर सहित यौन संचारित रोगों [सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज] के पीछे एचपीवी को जिम्मेदार माना जाता है।
शोधार्थियों ने खतना करा चुके पुरुष के साथ यौन संबंध बनाने वाली महिलाओं को उन महिलाओं की तुलना में सर्वाइकल कैंसर का खतरा कम पाया जिन्होंने खतना नहीं कराने वाले पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाया।
इतना ही नहीं अमेरिका के बाल्टीमोर में अफ्रीकी-अमेरिकियों पर किए गए शोध में खतना कराने वाले 10 फीसदी पुरुषों के मुकाबले खतना नहीं कराने कराने वाले 22 फीसदी पुरुषों को एड्स से संक्रमित पाया गया। प्रमुख शोधकर्ता डा. रोनाल्ड ग्रे के मुताबिक अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी व हिस्पैनिक [लैटिन] पुरुषों में खतना की प्रथा कम पाई जाती है। इस कारण उनमें एड्स का खतरा ज्यादा पाया जाता है। दुनियाभर में हर साल 3.3 करोड़ लोग एड्स से संक्रमित होते हैं। वहीं पूरी दुनिया में प्रति वर्ष तीन लाख महिलाओं की सर्वाइकल कैंसर से मौत हो जाती है।
धन्‍यवाद 
http://in.jagran.yahoo.com/news/international/general/3_5_5081942.html/print/


------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
 female circumcision in islam
औरतों की खतना
कुरआन में खतना का जिकर नहीं, दीने इबराहीम abrahamic religions अर्थात यहूद, इसाई और मुसलमान में आखरी पेगम्‍बर मुहम्‍मद सल्‍ल. ने इस्‍लाम में पिछले धर्मों की जिन अच्‍छी बातों को जारी रखा उनमें एक मर्दों की खतना है,
महिलाओं की खतना का जिकर सही अहादीस में नहीं मिलता, जिन हदीसों को कमजोर हदीस माना गया है उनसे पता चलता है कि उस दौर में जिस व्‍यक्ति को बुरे अंदाज में पुकारना होता था तो कहा जाता था कि ''ओ महिलाओं की खतना करने वाली के बेटे'' अर्थात अच्‍छी बात नहीं समझी जाती थी,  लगभग सभी बडे मुस्लिम इदारों को इसको ना मानने पर इत्‍तफाक है इसी कारण यह केवल इधर उधर छोटी मोटी जगह पर कमजोर हदीसों पर अडे हुए या उनको इलाकाई रस्‍म व रिवाज पर अडे हुए लोगों जैसे की अफ्रीका आदि की सोच का नतीजा है, इंडिया पाकिस्‍तान बंग्‍लादेश यहां तक की अरब में भी यह बात मुसलमान भी नहीं जानते,  जानने पर हैरत का इजहार करते हैं,  इस लिए कुछ अडे हुए लोंगों की सोच का जिम्‍मेदार पूरी कौम को नहीं माना जा सकता, इधर कोई बुरी प्रथा नहीं जैसे कि सती प्रथा जिसे जबरदस्‍ती छूडवाया गया,

फिर भी जिसको यह बुरी प्रथा लगे वो मुस्लिम संस्‍थाओं की इस बात को फैलाए की इस बात को कमजोर हदीस का माना गया है इस लिए छोड दें
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
 

Wednesday, September 15, 2010

Arya Samaj - कुरआन पर आरोपः कितने स्तरीय ?

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के संस्करण 2006 के पृष्ठ संख्या (ग) पर संपादक की भूमिका में लिखा है कि स्वामी जी ने यद्यपि 14 समुल्लास ही लिखवाए थे, मगर इसके प्रथम संस्करण में प्रकाशक राजा जयकृष्ण दास ने 12 समुल्लास ही प्रकाशित किए। प्रथम संस्करण में अंतिम दो समुल्लास प्रकाशित न करने का कारण स्वामी जी ने यह लिखा है कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम प्रकाशक राजा जी ब्रिटिश सरकार में डिप्टी कलेक्टर थे। उन दिनों भारत में ब्रिटिश सरकार का आतंक था। फलतः सरकार के मुलाजिम होने के नाते वे ईसाई सरकार को अप्रसन्न नहीं करना चाहते थे। दूसरा कारण यह लिखा है कि प्रकाशक की मुस्लिम नेताओं से व्यक्तिगत दोस्ती थी। अतः ईसाई मत और कुरआन मत का खंडन छपवाना उस समय उचित न समझा गया।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के द्वितीय संस्करण सन् 1882 में 14 समुल्लास प्रकाशित किए गए। यहाँ सवाल यह पैदा होता है कि सन् 1882 में न तो देश के हालात बदले और न ही हुकूमत बदली, फिर क्यों अंतिम दो समुल्लास जोड़े गए ? दूसरा सवाल यह कि प्रकाशक की व्यक्तिगत मजबूरी के कारण एक ग्रंथ को आधा-अधूरा प्रकाशित करना औचित्यपूर्ण सा नहीं लगता। प्रकाशक बदला जा सकता था। पूरी कौम की नफ़रत और दुश्मनी में 10-20 मुस्लिम दोस्तों की दोस्ती कुरबान की जा सकती थी। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के द्वितीय संस्करण में 13वें और 14वें अध्यायों का प्रकाशन संदेहपूर्ण (Doubtful) है।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ का 14वां समुल्लास कुरआन से संबंधित है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता ने इस समुल्लास में बार-बार यह आरोप लगाया है कि यह कुरआन किसी अल्पज्ञ और जंगली व्यक्ति का बनाया हुआ है। खुदा के नाम से मुहम्मद साहब ने अपना मतलब सिद्ध करने के लिए यह क़ुरआन किसी कपटी-छली और महामूर्ख से बनवाया होगा। थोड़ी देर के लिए अगर यह बात मान भी ली जाए कि यह कुरआन किसी जंगली, अल्पज्ञ और महामूर्ख व्यक्ति (खुदा माफ करें) द्वारा बनाई हुई पुस्तक है तो यहाँ एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि क्या कोई अल्पज्ञ और जंगली व्यक्ति इतनी शुद्ध भाषा में कोई पुस्तक लिख सकता है ? तथ्यों की बात बाद में करेंगे। इस पुस्तक में व्याकरण आदि की लेशमात्र भी गलती क्यों नहीं है ? आज तक इस पुस्तक में किसी भाषा संशोधन अथवा सुधार की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी? 1400 वर्षों की लम्बी अवधि में भी किसी अरबी भाषा के विद्वान और विशेषज्ञ ने इस पुस्तक में कोई गलती क्यों नहीं पकड़ी? इस पुस्तक का आज तक कोई प्रूफ संशोधन क्यों नहीं हुआ? कुरआन की भाषा शैली विशुद्ध, अनूठी और अद्भुत है। क्या कोई निरक्षर व्यक्ति इतनी विशुद्ध, प्रवाहपूर्ण और अनूठी भाषा शैली का प्रयोग कर सकता है ? दूसरा सवाल यह है कि मुहम्मद साहब (सल्ल0) अपना ऐसा कौन-सा मतलब सिद्ध करना चाहते थे जिसके लिए आपको जंगली, अल्पज्ञ और छली-कपटी व्यक्तियों का सहयोग लेना पड़ा ? तीसरा सवाल यह है कि क्या कोई छली-कपटी और स्वार्थी व्यक्ति इतने उच्च नैतिक मूल्यों का प्रतिपादन और स्थापन कर सकता है जितने उच्च और उत्तम मूल्य कुरआन में प्रतिपादित किए गए हैं?

उदाहरणार्थ कुछ अंशों को देखिए -
1. ‘‘बेहयाई के करीब तक न जाओ चाहे वह जाहिर हो या पोशीदा।’’ (कुरआन 6-152)
2. ‘‘निर्धनता के भय से अपनी औलाद का क़त्ल न करो।’’ (कुरआन 6-152)
3. ‘‘जब बात कहो, इंसाफ की कहो चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो।’’ (कुरआन 6-153)
4. ‘‘किसी मांगने वाले को मत झिड़को।’’ (कुरआन 93-10)
5. ‘‘बुराई का बदला भलाई से दो।’’ (कुरआन 41-34)
6. ‘‘भलाई में एक दूसरे से बढ़ जाने का प्रयास करो।’’ (कुरआन 3-48)
7. ‘‘माँ-बाप को उफ तक न कहो और न उन्हें झिड़को।’’ (कुरआन 17-23)
8. ‘‘जुआ, ‘शराब, देवस्थान व पांसे गंदे शैतानी काम है इनसे अलग रहो।’’ (कुरआन 5-90)

चोथा सवाल यह है कि क्या कोई विद्याहीन और जंगली व्यक्ति रहस्य पूर्ण ब्रह्मांडीय सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकता है ? कुरआन में वर्णित अनेक भूगोलीय और खगोलीय तथ्य आज विज्ञान की कसौटी पर सत्य साबित होते जा रहे हैं जिन्हें उस वक्त कोई नहीं जानता था। अब क्या उक्त आरोप कि कुरआन किसी अल्पज्ञ और कपटी-छली द्वारा बनाया गया है, तर्कहीन और मूर्खतापूर्ण नहीं है ?

‘सत्यार्थ प्रकाश’ जो एक वेद विद्वान और संस्कृत के प्रकांड पंडित का लिखा हुआ बताया जाता है, इसके अब तक 38 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। कई बार वेद-विद्वानों और विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा इसके प्रूफ शौधन का प्रयास किया गया, मगर आज तक इसकी भाषा और व्याकरण ही शुद्ध न हो सकी। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि इस ग्रंथ के संपादको और अनुयायियों ने कभी इसे न गंभीरता से लिया है और न ही कोई खास महत्व ही दिया है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का 38वां संस्करण जो सन् 2006 में प्रकाशित हुआ और जिसका संपादन पंडित भगवद्दत् (रिसर्च स्कॉलर) ने किया। इस संस्करण को साढ़े तीन माह तक विद्वानों की एक टीम द्वारा प्रूफ शोधन के बाद प्रकाशित कराया गया। लिखा गया है कि इस बार सर्वशुद्ध ‘सत्यार्थ प्रकाश’ देने का प्रयास किया जा रहा है, मगर नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ व्याकरण की अशुद्धियाँ आज तक भी ‘शुद्ध नहीं हो पाई। भाषा व्याकरण तो क्या, उसमें वर्णित कुरआन की आयतों के नम्बर व तरतीब तक गलत है।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता द्वारा 14वें समुल्लास में जितनी गंदी और घटिया भाषा का प्रयोग किया गया है, समीक्षा में तर्क और तथ्य भी उतने ही घटिया बचकाने और मूर्खता पूर्ण हैं। न कहीं गंभीर विचार है, न कोई युक्ति है और न तर्क। लगता है लेखक यह जानता ही न था कि तर्क क्या होता है ? तथाकथित विद्वान द्वारा कुरआन के तथ्यों के साथ जो खिलवाड़ किया गया है और बेधड़क होकर जिस तरह कीचड़ उछाली गई है, इससे प्रतीत होता है कि कथित लेखक दुराभाव के कारण अपनी अक्ल ही खो बैठा था।

समीक्षा क्रम सं0 43, 99, 112 में कथित लेखक ने लिखा है कि कुरआन का कर्ता न तो खगोल विद्या (Astronomy) जानता था और न ही उसे भूगोल (Geography½ की विद्या आती थी। लेखक ने लिखा है कि क्या सूरज और चाँद सदा घूमते हैं और पृथ्वी नहीं घूमती ? यदि कुरआन का बनाने वाला पृथ्वी का घूमना आदि जानता तो यह बात कभी न कहता कि पहाड़ों के धरने से पृथ्वी नहीं हिलती। इससे विदित होता है कि कुरआन के बनाने वाले को भूगोल-खगोल की विद्या नहीं थी।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के अष्टम समुल्लास में लिखा है कि सविता अर्थात वर्षा आदि का कर्ता अपनी परिधि (Axis) में घूमता है, किन्तु किसी लोक के चारों ओर (Orbit) नहीं घूमता। (प्रश्न क्रम सं0 70)

स्वामी जी ने अपनी उक्त धारणा को सत्य साबित करने के लिए यजुर्वेद का एक मंत्र भी प्रस्तुत किया है।
‘‘आ कृष्णेन रजसा वत्र्तमानो निवेशयमृतं मत्र्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।’’
(क्रम सं0 71)
जबकि कुरआन में लिखा है -
1. ‘‘और सूर्य वह अपने ठिकाने की तरफ चला जा रहा है।’’
“And the Sun runs onto a resting place” (36-38)
2. ‘‘और वही है जिसने रात और दिन और सूरज और चांद बनाए। सब एक-एक मदार में तैर रहे हैं।
“It is who created the night and the day and the sun and the
moon : all (the celestial bodies) swim along, each in its rounded
orbits. (21-23)

कुरआन की उक्त आयतों से स्पष्ट है कि सभी आकाशीय पिंड (All Celestial Bodies) न केवल अपनी धुरी (Axis) पर घूम रहे हैं, बल्कि अपनी-अपनी कक्षा (Orbit) में भी चक्कर लगा रहे हैं। जिस प्रकार हमारी पृथ्वी की अपनी धुरी (Axis) पर औसत गति 1610 कि.मी. प्रति घंटा और अपनी कक्षा (Orbit) में औसत गति 107160 कि.मी. प्रति घंटा है, ठीक इसी प्रकार सूरज और चांद की गतियाँ हैं। हमारा सूर्य अपने परिवार और पड़ोसी तारों के साथ एक गोलाकार कक्षा (Orbit) में लगभग 9 लाख 60 हजार कि.मी. प्रति घंटा की अनुमानित गति से मंदाकिनी के केन्द्र के चारों ओर परिक्रमा कर रहा है, जबकि सूर्य को अपनी धुरी (Axis) पर एक पूर्ण चक्कर लगाने में 25.38 दिन का समय लगता है। इन वैज्ञानिक तथ्यों में अब कोई संदेह नहीं है, क्योंकि अब यह एक आंखों देखी सच्चाई है। हमारी पूरी पृथ्वी बिल्कुल एक जैसी नहीं है। यह कहीं से समतल है तो कहीं इस पर गहरे समुद्र हैं। दूसरी बात यह कि हमारी पृथ्वी अनेक परतों से बनी हुई है। अगर पृथ्वी पर गहरे समुद्र तो होते मगर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ न होते तो पृथ्वी का संतुलन (Balance) कैसे कायम होता ? पृथ्वी अपनी अक्ष (Axis) और कक्षा (Orbit) में संतुलित और सुव्यवस्थित गति से कैसे घूमती ? अगर पहाड़ न होते तो पृथ्वी की परतें कैसे एक दूसरे से बंधी रहती ? इस तरह के तथ्य हमें वेद मंत्रों में भी मिलते हैं। उक्त प्रकार की आयतें विज्ञान विषय से संबंध रखती हैं। बिना शोध, अन्वेषण और जानकारी के उक्त प्रकार की आयतों की समीक्षा लिखना क्या बौद्धिक पागलपन को नहीं दर्शाता ?
जिस विद्वान ने कुरआन पर यह आरोप लगाया है कि कुरआन का कर्ता यह भी नहीं जानता की पृथ्वी घूमती है, उस तथाकथित विद्वान को कुरआन का कितना ज्ञान था ? इसके साथ तथाकथित विद्वान ने यह भी कहा है कि सूर्य किसी लोक के चारों ओर नहीं घूमता। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के कर्ता की यह बात भी झूठी साबित हो गई। अफ़सोस इस बात का है कि आरोपी ने आरोप भी इतनी ढीठता और दंभ के साथ लगाए हैं, मानो वह स्वयं पृथ्वी आदि का बनाने और घुमाने वाला हो।

चैदहवें समुल्लास के रचयिता ने लिखा है कि कुरआन की दृष्टि से सारे हिंदू काफ़िर हैं, क्योंकि वे कुरआन और पैगम्बर को नहीं मानते। कुरआन की शिक्षा और आदेश यह है कि ‘‘काफिरों का कत्ल करो।’’ (समीक्षा क्रम सं0 2) कोई बताए कि कुरआन का अवतरण किस देश में कब और किस प्रकार हुआ ? कुरआन में जब यह हुक्म दिया गया तब कुरआन और पैग़म्बर को मानने वाले कितने लोग थे ? क्या 1000-1500 लोगों को ये हुक्म देना कि सारी दुनिया के लोग काफ़िर हैं, इन्हें जहां पाओ कत्ल करो, औचित्यपूर्ण और मुसलमानों के हित में था ? क्या 1000-1500 आदमी सारी दुनिया के काफ़िरों को कत्ल कर सकते हैं ?

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के लेखक ने मुसलमानों के लिए जंगली, अल्पज्ञ, विद्याहीन, म्लेच्छ, दुष्ट, धोखेबाज़, लड़ाईबाज़, गदर मचाने वाले, अन्यायी, विषयी (Sexual) आदि अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया है। वेद, मनुस्मृति और सत्यार्थ प्रकाश के कर्ता अनार्य (मुसलमान आदि), दुष्ट और वेदनिंदकों के लिए क्या सजा है ? यह वेद विद्वान अवश्य जानते होंगे। अगर नहीं जानते तो आइए देखिए

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में कहाँ क्या लिखा है?
1. ‘‘आर्यों से भिन्न मनुष्यों का नाम दस्यु है।’’
(समुल्लास-11, क्रम सं0-1),
2. ‘‘दस्यु दुष्ट मनुष्य को कहते हैं।’’
(स्वमंत व्यामन्तव्यप्रकाशः क्रम सं0 29)।
3. ‘‘दुष्ट मनुष्य को मारने में हन्ता को कोई पाप नहीं लगता।’’ (षष्ठ समु0 मनु0-11)।
जब आर्यों से भिन्न सभी मनुष्य ‘दुष्ट’ हैं और उन्हें मारने में भी कोई पाप नहीं है तो फिर ‘काफिर’ शब्द को लेकर इतना बवाल क्यों ? जिस प्रकार वेद के न मानने वालों को नास्तिक कहा गया है, ठीक उसी प्रकार कुरआन के न मानने वालों को काफ़िर कहा गया है। यह कैसा चरित्र और कैसी नैतिकता है कि हमारी हर बात सही और दूसरों की सही भी गलत ? कुरआन में तो काफ़िर शब्द उन लोगों के लिए आया है कि जो हक़ के दुश्मन थे और साजिशें कर रहे थे। कुरआन की प्रत्येक आयत अपना एक ख़ास संदर्भ रखती है। संदर्भ को समझे बिना हम किसी आयत का अर्थ और भावार्थ नहीं समझ सकते।

समीक्षा क्रम सं0 159 में लिखा है कि ऊँटनी के लेख से यह अनुमान होता है कि अरब देश में ऊँट-ऊँटनी के सिवाय दूसरी सवारी कम होती है। इससे सिद्ध होता है कि किसी अरब देशीय ने कुरआन बनाया है। उक्त बात से पाठक ये अंदाजा बखूबी लगा सकते हैं कि जो आदमी कुरआन की समीक्षा लिखने बैठा है, उसका बौद्धिक स्तर कितना ऊँचा है ? वह यह भी नहीं जानता था कि कुरआन का अवतरण कब, कहाँ और किस प्रकार हुआ? उसने कुरआन में ऊँट शब्द पढ़कर अनुमान लगाया कि कुरआन किसी अरबी व्यक्ति द्वारा बनाया गया है।
समीक्षा क्रम सं0 34 में लिखा है कि सुअर का निषेध, क्या मनुष्य का मांस खाना उचित है ? कितना बचकाना और बेतुका सवाल है ? कुरआन में नशे (शराब) का निषेध किया है। अब कोई यह सवाल करें कि कुरआन में जहर और तेज़ाब पीने का निषेध क्यों नहीं किया गया है ? तो क्या यह सवाल और आरोप मूर्खतापूर्ण नहीं होगा ? इस तरह तो एक पुस्तक खाने-पीने के विधि-निषेधों के लिए ही अपर्याप्त रहेगी। तात्कालिक समाज में जो बड़ी बुराइयाँ होती हैं, एक संदेशवाहक द्वारा उनकी ही निशानदेही की जाती है। आगे लिखा है कि मुर्दार हराम तो मारकर क्यों खाते हैं ? एक वेद विद्वान इतना भी नहीं जानता कि मुर्दार किसे कहते हैं ?

दिन में न खाना, रात को खाना सृष्टि क्रम के विपरीत है ? (समीक्षा क्रम सं0 35)। यह भी कितना बचकाना आरोप है ? कोई बताए कि उक्त तथ्य में कितनी वैज्ञानिक सच्चाई है ? अक्सर लोग दिन छिपने के बाद ही खाना खाते हैं। समीक्षा क्रम सं0 51 में लिखा है ‘‘जिस समय ईसाई और मुसलमानों का मत चला था, उस समय उन देशों में जंगली और विद्याहीन मनुष्य अधिक थे इसलिए ऐसे विद्या विरूद्ध मत चल गए। अब विद्वान अधिक हैं, इसलिए आज ऐसा मत नहीं चल सकता। किन्तु जो-जो ऐसे पोकल मज़हब हैं वे भी अस्त होते जाते हैं। वृद्धि की तो कथा ही क्या है?’’ क्या उक्त आरोप किसी बुद्धिमान और जानकार व्यक्ति का हो सकता है ? क्या वास्तव में ईसाई और मुसलमान मत खत्म होते जा रहे हैं ? कोई बताए विद्वानों का कौन-सा मत है जो आज फैलता जा रहा है ? जैसा कि लिखा है कि अब विद्वान अधिक हैं, कोई बताए कि सन् 1875 में जब लेखक ने उक्त समीक्षा लिखी थी, कितने विद्वान थे ? स्वामी जी ने एक-एक कर सबकी ऐसी बखिया उधेड़ी है कि कोई भी बेदाग न छोड़ा। कोई मत ऐसा नहीं था जिसका लेखक ने खण्डन न किया हो।

समीक्षा क्रम सं0 53 में लिखा है कि अल्लाह ने तीन हजार फरिश्तों से मुसलमानों की मदद की, तो अब मुसलमानों की बादशाही बहुत सी नष्ट हो गई है और होती जाती है, अब अल्लाह क्यों मदद नहीं करता ? वैसे तो कुरआन की उक्त आयत एक खास संदर्भ में कही गई है मगर क्या दुनिया से मुसलमानों की बादशाही नष्ट हो गई है या उस वक्त से ज़्यादा है जब यह समीक्षा लिखी गई थी ? कोई यह भी तो बताए कि आरोप लगाने वालों की बादशाहत दुनिया में कितनी और कहाँ-कहाँ है ? आगे कुछ बाते मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ ताकि आलेख बहुत लम्बा न हो जाए।
समीक्षा क्रम सं0 98 ः ‘‘क्या खुदा ऊपर रहता है ?’’ क्या यह भी कोई आरोप है ? आरोपों का स्तर देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी कोई विकृत मानसिकता का व्यक्ति था। क्या उक्त आरोप का भावार्थ यह नहीं है कि खुदा सबसे बड़ा और ऊपर है। समीक्षा क्रम सं0 99 ः क्या चांद, सूरज सदा फिरते हैं और पृथ्वी नहीं फिरती ? कुरआन में यह कहाँ लिखा है कि पृथ्वी नहीं घूमती ? समीक्षा क्रम सं0 96 ः और जो खुदा मेघ विद्या जानता तो आकाश से पानी उतारा लिखा पुनः यह क्यों लिखा कि पृथ्वी से पानी ऊपर चढ़ाया ? लगता है आरोप लगाने वाला व्यक्ति कोई ज्यादा बड़ा वैज्ञानिक और पदार्थ विद्या का विशेषज्ञ है। कोई बताए इसमें क्या कुछ गलत लिखा है ? वर्षा का एक चक्र है जो घूमता रहता है।
समीक्षा क्रम सं0 104 ः ‘‘प्रत्येक की गर्दन में कर्म पुस्तक। हम तो किसी एक की गर्दन में भी नहीं देखते ?’’ कितना विद्वतापूर्ण आरोप है ? भला आत्मा कहीं दिखाई देती है ? ‘शायद हम कर्मपत्र को मरने के बाद ही समझे।

समीक्षा क्रम सं0 105 ः न्याय तो वेद और मनुस्मृति में देखो जिसमें क्षणमात्र भी विलम्ब नहीं होता और अपने-अपने कर्मानुसार दण्ड व प्रतिष्ठा सदा पाते रहते हैं। कोई बताए वह कौन-सी जगह है जहाँ हर क्षण न्याय हो रहा है? एक व्यक्ति अपनी पूरी जिंदगी लूट खसोट करता है, मगर यहाँ उसका कभी बाल-बांका नहीं होता।

समीक्षा क्रम सं0 142 ः दूध की नहरे कभी हो सकती हैं? क्योंकि वह थोड़े समय में बिगड़ जाता है। भला जिसने इतना विशाल और अद्भुत ब्रह्मांड बनाया, क्या वह ऐसे दूध की नदियां नहीं बहा सकता जो कभी खराब न हो ? यहाँ दूध का मतलब गाय-भैंस का दूध नहीं है, बल्कि दूध जैसा पौष्टिक और स्वादिष्ट कोई पेय पदार्थ है जो पानी जैसा भी हो सकता है।
समीक्षा क्रम सं0 129 में मुहम्मद (सल्ल0) को विषयी (Sexual) और समीक्षा क्रम सं0 152 में कुरआन को समलैंगिकता ¼Homosex½ का मूल बताया है। क्या इतना झूठा और घटिया आरोप लगाकर कथित लेखक ने निकृष्ट मानसिकता का परिचय नहीं दिया है ?
अक्सर अखबार में कुछ इस तरह के ‘शीर्षक लगाए जाते हैं। ‘‘सोने की हो गई चांदी’’, ‘‘चांदी औंधे मुंह गिरी’’। अगर कोई व्यक्ति उक्त शब्दों का बिना भावार्थ समझे यह आरोप लगाने लगे कि सोने की चांदी कैसे हो सकती है ? चांदी के कोई मुंह होता है जो वह मुंह के बल गिर जाएगी ? तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उक्त व्यक्ति में कितनी अक्ल होगी। 14वें समुल्लास के कर्ता की अक्ल उक्त व्यक्ति से ज्यादा नहीं है। संदर्भ को बिना समझे केवल बाह्य ‘शब्दों और अर्थां के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना और तर्कां का जवाब कुतर्कों से देना कहाँ का पांडित्व और विद्वता है ?

यहाँ यह भी विचारणीय है कि ‘‘कुरआन ईश्वरीय पुस्तक नहीं है।’’ यह साबित करने के लिए 200-400 आरोपों की भला क्या जरूरत है ? इसके लिए तो केवल एक ही आरोप काफी है बशर्ते उसे ठोस सबूतों से साबित किया जाए। इतने ढेर सारे आरोप लगाकर तो कथित व्यक्ति ने अपने आपको निर्बुद्धि, कपटी और सिरफिरा ही साबित किया है। ऐसा व्यक्ति जो किसी पुस्तक की न मूल भाषा जानता हो और न ही उपभाषा और बिना किसी अध्ययन और चिंतन के समीक्षा लिखनी प्रारम्भ कर दे और समीक्षा भी उस भाषा में लिखे, जिस भाषा का उसे समुचित ज्ञान न हो। क्या यह मूर्खता और धूर्तता की पराकाष्ठा नहीं है ?

उक्त बातों से स्पष्ट है कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के 14वें अध्याय की भाषा और तथ्य एक संन्यासी, वेद विद्वान, संस्कृत के प्रकांड पंडित के चरित्र से कोई मेल नहीं रखते। निकृष्ट और दंभ पूर्ण भाषा, मूर्खता पूर्ण और बचकाने तर्कों और तथ्यों का एक बाल ब्रह्मचारी, आचार्य और अध्यात्मवेत्ता के व्यक्तित्व और कृतित्व से भला क्या लेना-देना ? झूठ, कटु आलोचना, निंदा, गाली-गलौच, अमर्यादित और अहंकार पूर्ण भाषा, क्रोध, नफरत, पूर्वाग्रह आदि सब मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म के 10 लक्षणों और एक ब्रह्मचारी के चरित्र और आचरण के बिल्कुल विपरीत है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के 14वें अध्याय को एक ब्रह्मचारी और वैदिक विद्वान से जोड़ना हिमाकत और धृष्टता है। रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानन्द (1683-1902) को भी कुरआन के तथ्यों पर आपत्ति थी, मगर उन्होंने तो कभी कुरआन और पैग़म्बर के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं किया।

दाह संस्कारः कितना उचित?

 ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी दयानंद सरस्वती ने एक प्रश्न की समीक्षा में लिखा है कि मुर्दे को गाड़ने से संसार की बड़ी हानि होती है, क्योंकि वह सड़कर वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देता है। स्वामी जी आगे लिखते हैं कि मुर्दों को गाड़ने से अधिक भूमि खराब होती है। कब्रों को देखने से भय भी होता है, इसलिए गाड़ना आदि सर्वथा निषिद्ध है। लिखा है कि मुर्दों को सबसे बुरा गाड़ना है, उससे कुछ थोड़ा बुरा जल में डालना है, उससे कुछ एक थोड़ा बुरा जंगल में छोड़ना है और जो जलाना है वह सर्वोत्तम है, क्योंकि उसके सब पदार्थ अणु होकर वायु में उड़ जाते हैं। किसी ने स्वामी जी से कहा कि जिससे प्रीति हो उसको जलाना अच्छी बात नहीं है। गाड़ना तो ऐसा है जैसा उसको सुला देना है। इसलिए गाड़ना अच्छा है। स्वामी जी कहते हैं कि जो मृतक से प्रीति करते हो तो अपने घर में क्यों नहीं रखते ? और गाड़ते भी क्यों हो ? जिस जीवात्मा से प्रीति थी वह तो निकल गया, अब दुर्गन्धमय मिट्टी से क्या प्रीति? जो प्रीति करते हों तो उसको पृथ्वी में क्यों गाड़ते हो, क्योंकि किसी से कोई कहे कि तुझको भूमि में गाड़ देवे तो वह सुनकर प्रसन्न कभी नहीं होता। (13-40, 41, 42)

एक सामान्य व्यवहार की बात है कि अगर बस्ती के पास कोई बदबूदार गंदगी या कोई जानवर जैसे चूहा, बिल्ली, कुत्ता आदि मरा पड़ा हो तो बदबू से बचने के लिए बस्ती के लोग उसे मिट्टी में दबा देते हैं ताकि बदबू फैलकर मनुष्यों को प्रभावित न करें। मनुष्य की अंतरात्मा कभी यह गवारा न करेगी कि किसी मृत जानवर को जलाया जाए। अगर कोई व्यक्ति किसी मृत जानवर को जलाएगा तो उसे अवश्य घिन आएगी। दूसरी यह बात भी सामान्य सी है कि जब किसी वस्तु आदि को जलाया जाता है तो उससे अवश्य वायु प्रदूषित होती है। मृत मनुष्यों को जलाना तो वस्तु आदि के जलाने से कहीं अधिक हानिकारक और ख़तरनाक है क्योंकि मृत मनुष्य को जलाने से न केवल वायु प्रदूषित होती है बल्कि रोगजनित गैसे भी निकलती हैं, जिनका प्रभाव मानव जीवन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अवश्य पड़ता है। तीसरा एक मानवीय पहलू यह भी है कि जिस व्यक्ति के साथ हमने जीवन गुजारा है, जो हमारी आदरणीय माँ, बाप, प्रिय पत्नी, पुत्र व पुत्री आदि है, मरने के बाद उसे अपनी आँखों के सामने, अपने ही हाथों से आग में रखना व उसकी हड्डियों तक को भस्मीभूत कर देना कहाँ की मानवता है ?

क्या यह क्रिया दिल दहला देने वाली नहीं है ? इस विषय से जुड़ा एक अनैतिक व अमानवीय पहलू यह भी देखने में आता है कि जब किसी लाश को जलाया जाता है तो कफ़न पहले जलता है और लाश नंगी हो जाती है। यह वाकिया मानवता को ‘शर्मसार करने वाला होता है। लाश अगर माँ अथवा औरत की हो तो इससे अधिक निर्लज्जता की बात क्या कोई और हो सकती है?

स्वामी दयानंद सरस्वती ने दाह संस्कार की जो विधि बताई है वह विधि दफ़नाने की अपेक्षा कहीं अधिक महंगी है। जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है कि मुर्दे के दाह संस्कार में ‘शरीर के वज़न के बराबर घी, उसमें एक सेर में रत्ती भर कस्तूरी, माशा भर केसर, कम से कम आधा मन चन्दन, अगर, तगर, कपूर आदि और पलाश आदि की लकड़ी प्रयोग करनी चाहिए। मृत दरिद्र भी हो तो भी बीस सेर से कम घी चिता में न डाले। (13-40,41,42)

स्वामी दयानंद सरस्वती के दाह संस्कार में जो सामग्री उपयोग में लाई गई वह इस प्रकार थी - घी 4 मन यानी 149 कि.ग्रा., चंदन 2 मन यानि 75 कि.ग्रा., कपूर 5 सेर यानी 4.67 कि.ग्रा., केसर 1 सेर यानि 933 ग्राम, कस्तूरी 2 तोला यानि 23.32 ग्राम, लकड़ी 10 मन यानि 373 कि.ग्रा. आदि। (आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक, ‘‘महर्षि दयानंद का जीवन चरित्र’’ से) उक्त सामग्री से सिद्ध होता है कि दाह संस्कार की क्रिया कितनी महंगी है। गरीब परिवार का कोई व्यक्ति इस क्रिया को निर्धारित सामग्री के साथ नहीं कर सकता। आज के भौतिकवादी दौर में उपरोक्त किसी भी सामग्री का ‘शुद्ध और स्वच्छ मिलना भी न केवल मुश्किल बल्कि असम्भव है। अतः दाह संस्कार की विधि निर्धारित नियमों व मानकों के आधार पर करना अव्यावहारिक है। दाह संस्कार में मुर्दे के वजन के बराबर घी का सिद्धांत यानी किसी व्यक्ति के दाह संस्कार में 9-10 कनस्तर घी का इस्तेमाल क्या बेतुका-सा नहीं लगता?

यहाँ एक बात यह भी विचारणीय है कि हिंदू समाज में बच्चों, साधु-संन्यासियों को और कुछ वर्गों में आम व्यक्तियों को दफ़न किया जाता है। जब जलाना सर्वोत्तम है तो फिर सर्वोत्तम विधि से बच्चों और साधु-संतों का अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता? एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि आर्य अपने मुर्दों को दफ़न करते थे, जलाते न थे। माह सितम्बर 2005 में, मेरठ के सिनौली स्थान पर 5 प्राचीनकालीन ‘शवधियाँ मिली थी, जिनमें मानव कंकाल सुरक्षित हालत में प्राप्त हुए थे। सभी ‘शवधियाँ एक विशिष्ट दिक्स्थापन (सिर उत्तर दिशा में और पैर दक्षिण दिशा में) पैर सीधे और मुंह को बांयी बगल की ओर करके लिटाई गई थी। यह एक सबूत इस बात का है कि प्राचीन लोग भारत में अपने मुर्दों को दफ़न करते थे।

हिंदू धर्म-दर्शन की यह धारणा कि मनुष्य का ‘शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है, मृत्युपरांत पंच तत्वों में विलीन किया जाना चाहिए। अगर इस धारणा को सही माना जाए तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मृत्युपरांत दाह संस्कार की विधि मानव ‘शरीर को पंच तत्वों में विलीन करने की उचित विधि नहीं है। पंच तत्वों में विलीन करने की उचित विधि केवल दफ़नाना ही है।

अग्नि द्वारा किए जाने वाले अंतिम संस्कार में अनेक रुढ़ियाँ व अनावश्यक अनुष्ठान होने के कारण यह क्रिया अत्यंत जटिल और लम्बी है। ये अनुष्ठान भी सार्वभौमिक नहीं है। अपने-अपने क्षेत्रीय, वर्गीय और जातीय रीति-रिवाज के अनुसार लोग अपने मुर्दों का दाह संस्कार करते हैं। अब तो हिंदू समाज में दाह संस्कार की नई-नई तकनीक आ गई हैं। रुपयों-पैसों की भाग-दौड़ में रिश्ते-नातों का महत्व कम हो गया है। लगता है हमारी मानवीय संवदेना मर सी गई है। अब घी, चंदन और केसर की जगह एल.पी.जी. (घरेलू गैस) और उच्च वोल्टेज की विद्युत ‘शक्ति का प्रयोग होने लगा है। इन आधुनिक ‘शवदाह गृहों में चंद मिनटों में काम तमाम। न घी, न चंदन, न कोई झंझट। क्या आधुनिक ‘शवदाह गृह इस बात का खुला प्रमाण नहीं है कि हमने अपनी सुविधानुसार अपने संस्कारों और जीवन मूल्यों को बदला है।

मुर्दे को दफ़न करना एक सार्वभौमिक सत्य है। यह क्रिया सस्ती भी है, आसान भी है और उत्तम भी। साथ-साथ मानवीय मूल्यों के अनुकूल भी है। कब्र को मुर्दे के वहाँ पहुंचने से पहले तैयार कर लिया जाता है। मृत को कब्र में ऐसे लिटा दिया जाता है मानो सुलाकर कमरा बंद कर दिया हो। अब मृत के साथ जो हो रहा है वह कम से कम हमारी आंखों के सामने और स्वयं हमारे द्वारा तो नहीं किया जा रहा है। दफ़नाने में मानवीय मूल्यों का पूरा-पूरा लिहाज़ रखा जाता है। अब रही बात प्रदूषण की तो उचित रूप से दफ़नाए जाने पर वायु प्रदूषण ‘शून्य प्रतिशत होगा। आज विज्ञान का युग है। ‘शोध द्वारा भी हम यह जान सकते हैं कि जलाने और दफ़नाने में कौन-सी विधि प्रदूषण रहित, उत्तम, सस्ती और आसान है। स्वामी जी का यह तर्क कि मुर्दों को दफ़नाने में भूमि अधिक खराब होती है, कोई बौद्धिक और व्यावहारिक तर्क नहीं है। विश्व में ईसाई, यहूदी, मुसलमान, कम्युनिस्ट यानी करीब 85 प्रतिशत लोग अपने मुर्दों को दफ़न करते हैं। पृथ्वी इतनी विशाल है कि मानव जाति कभी उसका पूर्ण प्रयोग न कर सकेगी। दफ़नाने की विधि आज भी ज्यों की ज्यों है जबकि जलाने की विधि बदलती जा रही है।

मृत व्यक्ति को जलाना इसलिए भी उचित नहीं है, क्योंकि अगर किसी व्यक्ति की जानबूझकर किसी “शडयंत्र के तहत हत्या की गई है तो न्यायिक प्रक्रिया में हत्या के साधनों और कारणों को जानना अति आवश्यक है। हत्या के बाद मृत को तुरन्त जलाकर हत्या संबंधी सबूत छिप जाते हैं और अपराधी पर हत्या का केस कमजोर पड़ जाता है। आए दिन सुनने और पढ़ने में आता है कि बहू अथवा किसी अन्य को जलाकर, जहर देकर अथवा गला घोंटकर मार दिया जाता है और लाश को जलाकर अतिशीघ्र ठिकाने लगा दिया जाता है ताकि हत्या के साधनों को छिपाकर कानून से बचा जा सके। इससे न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती है और मृत के संबंधियों को न्याय मिलने की सम्भावना भी कम रह जाती है। दफ़न करने की स्थिति में हत्या संबंधी जांच कई दिन बाद तक की जा सकती है।

स्वामी जी ने अपनी समीक्षा में जिस तथ्य पर अधिक ज़ोर दिया है वह यह है कि मुर्दे को गाड़ने से वायु प्रदूषित होती है, जलाने से वायु प्रदूषित नहीं होती। यह कितना अजीब और बचकाना तर्क है? कोई बताए कि वह कौन-सा विज्ञान है जो कहता है कि जलाने से वायू प्रदूषित नहीं होती ? मुर्दे को जलाने में जो कनस्तरों घी, केसर, कस्तूरी, चंदन आदि सामग्री के इस्तेमाल का उपदेश और आदेश स्वामी जी ने दिया है, क्या यह इसलिए नहीं है कि उक्त सामग्री के साथ जलने से मुर्दे की दुर्गन्ध हमें महसूस न हो? वरना इतनी कीमती सामग्री के साथ मुर्दे को जलाने का आखिर औचित्य क्या है ? स्वामी जी का दूसरा तथ्य यह है कि मुर्दे को जलाने से उसके सब पदार्थ अणु बनकर वायु में उड़ जाते हैं। कोई बताए कि मुर्दे के अणु आसमान में उड़कर कहाँ चले जाते हैं ?

स्वामी जी ने अपनी समीक्षा में जो तीसरा तथ्य प्रस्तुत किया है वह यह है कि किसी से कोई कहे कि तुझको भूमि में गाड़ देवें तो यह सुनकर वह प्रसन्न कभी नहीं होता। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं है कि उक्त बात मृत से कही जा रही है या जीवित से)। उक्त बात कितनी बेतुकी और हास्यास्पद है ? क्या कोई यह कहने से खुश होता है कि आ तुझे जला दें ? स्वामी जी का चैथा तथ्य यह है कि मुर्दे के मुंह, आंख और ‘शरीर पर धूल, पत्थर, ईंट, चूना डालना, छाती पर पत्थर रखना कौन-सा प्रीति का काम है ? कोई बताए कि मुर्दे की छाती पर कौन ईंट पत्थर रखता है ? क्या स्वामी जी इतना भी नहीं जानते थे कि मृत व्यक्ति को दफ़न किस प्रकार किया जाता है। छाती पर लक्कड़ तो मृत व्यक्ति को जलाने में रखे जाते हैं न कि दफ़न करने में। किसी वेद विद्वान द्वारा क्या खूब बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल किया गया है। स्वामी जी द्वारा पांचवी बात जो कही गई है वह यह कि मुर्दे को गाड़ने से बेहतर जंगल में छोड़ देना है। क्या यह बावलेपन की बात नहीं है? क्या उक्त बातों से यह सिद्ध नहीं होता कि हमें बस सच्चाई की जिद है। हमें हर हाल में सच्चाई का विरोध ही करना है, नतीजा कुछ भी हो। स्वामी जी ने छठी बात जो कही गई है कि कब्रों को देखने से भय भी होता है। कोई बताए कि मुर्दा किसी का क्या बिगाड़ सकता है ?
ऐसा प्रतीत होता है कि किसी संदेशवाहक की पारलौकिक धारणा की जिद और विरोध में किसी समुदाय विशेष द्वारा जलाने के तरीके को अपनाया गया होगा। बाद में यह तरीका उस समुदाय की मान्यता और परंपरा बन गई होगी। दाह संस्कार धर्म विरूद्ध, विज्ञान विरूद्ध और मानवीय मूल्यों के खि़लाफ़ है। अंत में मैं एक सवाल भी वेद विद्वानों से करूंगा कि कृपया वे बताए कि ‘मनुस्मृति’ के रचयिता महर्षि मनु की लाश को उनके अनुयायियों द्वारा जलाया गया था या दफ़न किया गया था?
............
दूसरी तरफ कबर देखें,,,नीचे दिए गए गढे में मुरदा कफन अर्थात कपडे में नहला धुलाकर सम्‍मान से लिटा देते हैं फिर लकडी के तखते से नीचे वाला गढा तखतों की छत से बंद कर दिया जाता उसके उपर मिटटी डाली जाती है, 

Sunday, September 12, 2010

नियोग और नारी

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास के क्रम सं0 120 से 149 तक की सामग्री पुनर्विवाह और नियोग विषय से संबंधित है। लिखा है कि

द्विजों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में पुनर्विवाह कभी नहीं होने चाहिए। (4-121)
स्वामी जी ने पुनर्विवाह के कुछ दोष भी गिनाए हैं जैसे -
(1) पुनर्विवाह की अनुमति से जब चाहे पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष छोड़कर दूसरा विवाह कर सकते हैं।
(2) पत्नी की मृत्यु की स्थिति में अगर पुरुष दूसरा विवाह करता है तो पूर्व पत्नी के सामान आदि को लेकर और यदि पति की मृत्यु की स्थिति में स्त्री दूसरा विवाह करती है तो पूर्व पति के सामान आदि को लेकर कुटुम्ब वालों में झगड़ा होगा।
(3) यदि स्त्री और पुरुष दूसरा विवाह करते हैं तो उनका पतिव्रत और स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाएगा।
(4) विधवा स्त्री के साथ कोई कुंवारा पुरुष और विधुर पुरुष के साथ कोई कुंवारी कन्या विवाह न करेगी। अगर कोई ऐसा करता है तो यह अन्याय और अधर्म होगा। ऐसी स्थिति में पुरुष और स्त्री को नियोग की आवश्यकता होगी और यही धर्म है। (4-134)

किसी ने स्वामी जी से सवाल किया कि अगर स्त्री अथवा पुरुष में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है और उनके कोई संतान भी नहीं है तब अगर पुनर्विवाह न हो तो उनका कुल नष्ट हो जाएगा। पुनर्विवाह न होने की स्थिति में व्यभिचार और गर्भपात आदि बहुत से दुष्ट कर्म होंगे। इसलिए पुनर्विवाह होना अच्छा है। (4-122)
जवाब दिया गया कि ऐसी स्थिति में स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य में स्थित रहे और वंश परंपरा के लिए स्वजाति का लड़का गोद ले लें। इससे कुल भी चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और अगर ब्रह्मचारी न रह सके तो नियोग से संतानोत्पत्ति कर ले। पुनर्विवाह कभी न करें। आइए अब देखते हैं कि ‘नियोग’ क्या है ?

अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है। जैसा कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। (4-143)

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
भावार्थ ः ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’
इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति महाशय को आज्ञा दे कि हे स्वामी! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।

अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है। (4-145)

प्रश्न सं0 149 में लिखा है कि अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें। (4-149)
लिखा है कि नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं। (4-142) विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।
पुनर्विवाह और नियोग से संबंधित कुछ नियम, कानून, ‘शर्ते और सिद्धांत आपने पढ़े जिनका प्रतिपादन स्वामी दयानंद ने किया है और जिनको कथित लेखक ने वेद, मनुस्मृति आदि ग्रंथों से सत्य, प्रमाणित और न्यायोचित भी साबित किया है। व्यावहारिक पुष्टि हेतु कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी कथित लेखक ने प्रस्तुत किए हैं और साथ-साथ नियोग की खूबियां भी बयान की हैं। इस कुप्रथा को धर्मानुकूल और न्यायोचित साबित करने के लिए लेखक ने बौद्धिकता और तार्किकता का भी सहारा लिया है। कथित सुधारक ने आज के वातावरण में भी पुनर्विवाह को दोषपूर्ण और नियोग को तर्कसंगत और उचित ठहराया है। आइए उक्त धारणा का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।
ऊपर (4-134) में पुनर्विवाह के जो दोष स्वामी दयानंद ने गिनवाए हैं वे सभी हास्यास्पद, बचकाने और मूर्खतापूर्ण हैं। विद्वान लेखक ने जैसा लिखा है कि दूसरा विवाह करने से स्त्री का पतिव्रत धर्म और पुरुष का स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाता है परन्तु नियोग करने से दोनों का उक्त धर्म ‘ाुद्ध और सुरक्षित रहता है। क्या यह तर्क मूर्खतापूर्ण नहीं है ? आख़िर वह कैसा पतिव्रत धर्म है जो पुनर्विवाह करने से तो नष्ट और भ्रष्ट हो जाएगा और 10 गैर पुरुषों से यौन संबंध बनाने से सुरक्षित और निर्दोष रहेगा ?

अगर किसी पुरुष की पत्नी जीवित है और किसी कारण पुरुष संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है तो इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि उस पुरुष में काम इच्छा ;ैमगनंस कमेपतम) नहीं है। अगर पुरुष के अन्दर काम इच्छा तो है मगर संतान उत्पन्न नहीं हो रही है और उसकी पत्नी संतान के लिए किसी अन्य पुरुष से नियोग करती है तो ऐसी स्थिति में पुरुष अपनी काम तृप्ति कहाँ और कैसे करेगा ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि नियोग प्रथा में हर जगह पुत्रोत्पत्ति की बात कही गई है, जबकि जीव विज्ञान के अनुसार 50 प्रतिशत संभावना कन्या जन्म की होती है। कन्या उत्पन्न होने की स्थिति में नियोग के क्या नियम, कानून और ‘शर्ते होंगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है ?

जैसा कि स्वामी जी ने कहा है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो भी पुरुष नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकता है। यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो इसके लिए स्त्री नहीं, पुरुष जिम्मेदार है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव जाति में लिंग का निर्धारण नर द्वारा होता है न कि मादा द्वारा।
यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ?
जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं। क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ? क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ? क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है?

कथित विद्वान लेखक ने नियोग प्रथा की सत्यता, प्रमाणिकता और व्यावहारिकता की पुष्टि के लिए महाभारत कालीन सभ्यता के दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि व्यास जी ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य के मर जाने के बाद उनकी स्त्रियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की। अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और एक दासी से विदुर की उत्पत्ति नियोग प्रक्रिया द्वारा हुई। दूसरा उदाहरण पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री का है। पाण्डु के असमर्थ होने के कारण दोनों स्त्रियों ने नियोग विधि से संतान उत्पन्न की। इतिहास भी इस बात का प्रमाण है।
जहाँ तक उक्त ऐतिहासिक तथ्यों की बात है महाभारत कालीन सभ्यता में नियोग की तो क्या बात कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना भी मान्य और सम्मानीय था। वेद व्यास और भीष्म पितामह दोनों विद्वान महापुरुषों की उत्पत्ति इस बात का ठोस सबूत है। दूसरी बात महाभारत कालीन समाज में एक स्त्री पांच सगे भाईयों की धर्मपत्नी हो सकती थी। पांडव पत्नी द्रौपदी इस बात का ठोस सबूत है। तीसरी बात महाभारत कालीन समाज में तो बिना स्त्री संसर्ग के केवल पुरुष ही बच्चें पैदा करने में समर्थ होता था।

महाभारत का मुख्य पात्र गुरु द्रोणाचार्य की उत्पत्ति उक्त बात का सबूत है। चैथी बात महाभारतकाल में तो चमत्कारिक तरीके से भी बच्चें पैदा होते थे। पांचाली द्रौपदी की उत्पत्ति इस बात का जीता-जागता सबूत है। अतः उक्त समाज में नियोग की क्या आवश्यकता थी ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि व्यास जी ने किस नियमों के अंतर्गत नियोग किया ? दूसरी बात नियोग किया तो एक ही समय में तीन स्त्रियों से क्यों किया? तीसरी बात यह कि एक मुनि ने निम्न वर्ण की दासी के साथ क्यों समागम किया ? चैथी बात यह कि कुंती ने नियम के विपरीत नियोग विधि से चार पुत्रों को जन्म क्यों दिया ? विदित रहे कि कुंती ने कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन चार पुत्रों को जन्म दिया और ये सभी पाण्डु कहलाए। पांचवी बात यह कि जब उस समाज में नियोग प्रथा निर्दोष और मान्य थी तो फिर कुंती ने लोक लाज के डर से कर्ण को नदी में क्यों बहा दिया ? छठी बात यह है कि वे पुरुष कौन थे जिन्होंने कुंती से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की ? स्वामी जी ने बहुविवाह का निषेध किया है जबकि उक्त सभ्यता में बहुविवाह होते थे। अब क्या जिस समाज से स्वामी जी ने नियोग के प्रमाण दिए हैं, उस समाज को एक उच्च और आदर्श वैदिक समाज माना जाए ?
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के ‘शंका-समाधान परिशिष्ट में पं0 ज्वालाप्रसाद ‘ार्मा द्वारा नियोग प्रथा के समर्थन में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में कुलनाश के भय से ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुषों से नियोग द्वारा वीर्य ग्रहण कर उच्च कुल की स्त्रियां संतान उत्पन्न करती थी। जो प्रमाण पंडित जी ने प्रस्तुत किए हैं वे सभी महाभारत काल के हैं। क्या महाभारत काल ही प्राचीन वैदिक काल था ? क्या नियोग ही ऋषियों का एक मात्र प्रयोजन था?
यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती नियोग को एक वेद प्रतिपादित और स्थापित व्यवस्था मानते थे तो उन्होंने इस परंपरा का खुद पालन करके अपने अनुयायियों के लिए आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया ? इससे स्वामी जी के चरित्र को भी बल मिलता और एक मृत प्रायः हो चुकी वैदिक परंपरा पुनः जीवित हो जाती। यह भी एक अजीब विडंबना है कि जिस वैदिक मंत्र से स्वामी जी ने नियोग परंपरा को प्रतिपादित किया है उसी मंत्र से अन्य वेद विद्वानों और भाष्यकारों ने विधवा पुनर्विवाह का प्रतिपादन किया है। निम्न मंत्र देखिए -
‘‘कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः।
को वां ‘ात्रुया विधवेव देवरं मंर्य न योषा कृणुते सधस्य आ।।
(ऋग्वेद, 10-40-2)
‘‘उदीष्र्व नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुप ‘ोष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिशोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।’’
(ऋग्वेद, 10-18-8)
उक्त दोनों मंत्रों से जहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती ने नियोग प्रथा का भावार्थ निकाला है वहीं ओमप्रकाश पाण्डेय ने इन्हीं मंत्रों का उल्लेख विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में किया है। अपनी पुस्तक ‘‘वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप’’ में उन्होंने लिखा है कि वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी। उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ उन्होंने निम्न प्रकार किया है -
‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’
इसी मंत्र का भावार्थ वैद्यनाथ ‘शास्त्री द्वारा निम्न प्रकार किया गया है -
‘‘जब कोई स्त्री जो संतान आदि करने में समर्थ है, विधवा हो जाती है तब वह नियुक्त पति के साथ संतान उत्पत्ति के लिए नियोग कर सकती है।’’
उक्त मंत्रों में स्वामी दयानंद ने देवर ‘शब्द का अर्थ जहाँ ‘द्वितीय नियुक्त पति’ लिया है वहीं पाण्डेय जी ने देवर ‘शब्द का अर्थ ‘द्वितीय विवाहित पति’ लिया है। निरुक्त के संदर्भ में पाण्डेय जी ने लिखा है कि यास्क ने अपने निरूक्त में देवर ‘शब्द का निर्वचन ‘द्वितीय वर’ के रूप में ही किया है। उक्त मंत्रों के साथ पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है। जो निम्न है -
‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्।
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः।।
समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः।
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।।’’
(अथर्वसंहिता 9-5-27,28)
उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत मुश्किल काम है? यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।
बेहद अफसोस और दुःख का विषय है कि जहाँ एक विद्वान और समाज सुधारक को पुनर्विवाह और विधवा विवाह का समर्थन करना चाहिए था, वहाँ कथित समाज सुधारक द्वारा नियोग प्रथा की वकालत की गई है और इसे वर्तमान काल के लिए भी उपयुक्त बताया है। क्या यह एक विद्वान की घटिया मनोवृत्ति का प्रतीक नहीं है ? आज की फिल्में जो कतई निम्न स्तर का प्रदर्शन करती हैं, उनमें भी कहीं इस प्रथा का प्रदर्शन और समर्थन देखने को नहीं मिलता। स्वामी दयानंद को छोड़कर नवजागरण के सभी विद्वानों और सुधारकों द्वारा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया गया है।
जब किसी कौम या समाज के धार्मिक लोग जघन्य नैतिक बुराइयों और बिगाड़ में गर्क हो जाते हैं, तो वह कौम नैतिक पतन की पराकाष्ठा को पहुंच जाती है। नैतिक बुराइयों में निमग्न होने के बावजूद कथित धार्मिक लोग अपने बचाव और समाज में अपना स्तर और आदर-सम्मान बनाए रखने के लिए और साथ-साथ अपने को सही और सदाचारी साबित करने के लिए उपाय तलाशते हैं। अपने बचाव के लिए कथित मक्कार लोग अपनी धार्मिक पुस्तकों से छेड़छाड़ करते हैं और उनमें फेरबदल कर उस नैतिक बुराई को जो उनमें है, अपने देवताओं, अवतारों, ऋषियों, मुनियों और आदर्शों से जोड़ देते हैं और जनसाधारण को यह समझाकर अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं कि यह बुराई नहीं है बल्कि धर्मानुकूल है। ऐसा तो हमारे ऋषि-मुनियों और महापुरुषों ने भी किया है। नियोग के विषय में भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है। जब कौम में स्वच्छंद यौन संबंधों की अधिकता हो गई और जो बुराई थी, वह सामाजिक रस्म और रिवाज बन गई तो मक्कार लोगों ने उस बुराई को अच्छाई बनाकर अपने धार्मिक ग्रंथों में प्रक्षेपित कर दिया। प्राचीन काल में धार्मिक ग्रंथों में परिवर्तन करना आसान था, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों पर चन्द लोगों का अधिकार होता था। नियोग एक गर्हित और गंदी परंपरा है, इसे किसी भी काल के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।
भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि, मुनियों और महापुरुषों द्वारा कुछ ऐसे नियम-कानून बनाए गए, जिन्होंने नारी को भोग की वस्तु और नाश्ते की प्लेट बना दिया। नियोग प्रथा ने विधवा स्त्री को कतई वेश्या ही बना दिया। जैसा कि आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि एक विधवा 10 पुरुषों से नियोग कर सकती है। यहाँ विधवा और वेश्या ‘शब्दों को एक अर्थ में ले लिया जाए तो ‘शायद अनुचित न होगा। विधवाओं की दुर्दशा को चित्रित करने वाली एक फिल्म ‘वाटर’ सन् 2000 में विवादों के कारण प्रतिबंधित कर दी गई थी, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर विधवाओं को वेश्याओं के रूप में दिखाया गया था। प्रायः विधवा स्त्रियाँ काशी, वृन्दावन आदि तीर्थस्थानों में आकर मंदिरों में भजन-कीर्तन करके और भीख मांगकर अपनी गुजर बसर करती थी, क्योंकि समाज में उनको अशुभ और अनिष्ट सूचक समझा जाता था।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने भी इस दशा का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘‘वृंदावन जब था तब था अब तो वेश्यावनवत्, लल्ला-लल्ली और गुरु-चेली आदि की लीला फैल रही है। (11-159), आज भी काशी में लगभग 16000 विधवाएं रहती हैं।
‘मनुस्मृति’ में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं। (3-21) इनमें आर्ष, आसुर और गान्धर्व विवाह को निकृष्ट बताया गया है मगर ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और मर्मज्ञों ने इनका भरपूर फायदा उठाया। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, मुनि पराशर, कौरवों-पांडवों के पूर्वज ‘ाान्तनु, पाण्डु पुत्र अर्जुन और भीम आदि ने उक्त प्रकार के विवाहों की आड़ में नारी के साथ क्या किया ? इसका वर्णन भारतीय ग्रंथों में मिलता है।
भारतीय ग्रंथों में नारी को किस रूप में दर्शाया गया है आइए अति संक्षेप में इस पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं।
1. ‘‘ढिठाई, अति ढिठाई और कटुवचन कहना, ये स्त्री के रूप हैं। जो जानकार हैं वह इन्हें ‘ाुद्ध करता है।’’ (ऋग्वेद, 10-85-36)
2. ‘‘सर्वगुण सम्पन्न नारी अधम पुरुष से हीन है।’’
(तैत्तिरीय संहिता, 6-5-8-2)
3. नारी जन्म से अपवित्र, पापी और मूर्ख है।’’ (रामचरितमानस)
उक्त तथ्यों के आधार पर भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति और दशा का आकलन हम भली-भांति कर सकते हैं। भारतीय ग्रंथों में नारी की स्थिति दमन, दासता और भोग की वस्तु से अधिक दिखाई नहीं पड़ती। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या आधुनिक भारतीय नारी चिंतकों की सोच अपने ग्रंथों से हटकर हो सकती है ? आइए भारतीय संस्कृति में नारी की दशा का आकलन करने के लिए छांदोग्य उपनिषद् के एक मुख्य प्रसंग पर भी दृष्टि डाल लेते हैं।
नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि, बह्वहं चरन्ती
परिचारिणी यौवने त्वामलमे साहमेतन्न वेद यद्
गोत्रत्वमसि, जाबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम
त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति।
(छांदोग्य उपनिषद् 4-4-2)
यह प्रसंग सत्यकाम का है। जिसकी माता का नाम जबाला था। सत्यकाम गौतम ऋषि के यहाँ विद्या सीखना चाहता था। जब वह घर से जाने लगा, तब उसने अपनी माँ से पूछा ‘‘माता मैं किस गोत्र का हूँ ?’’ उसकी माँ ने उससे कहा, ‘‘बेटा मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है। अपनी युवावस्था में, जब मैं अपने पिता के घर आए हुए बहुत से अतिथियों की सेवा में रहती थी, उस समय तू मेरे गर्भ में आया था। मैं नहीं जानती तेरा गोत्र क्या है ? मेरा नाम जबाला है, तू सत्यकाम है, अपने को सत्यकाम जबाला बताना।’’
क्या उपरोक्त उद्धरणों से तथ्यात्मक रूप से यह बात साबित नहीं होती कि भारतीय चिंतन में नारी को न केवल निम्न और भोग की वस्तु बल्कि नाश्ते की प्लेट समझा गया है ?

Friday, September 10, 2010

सत्यार्थ प्रकाशः भाषा, तथ्य और विषयवस्तु

आर्य समाज संस्था के निर्माता आचार्य स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित अनेक ग्रंथों में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ मुख्य ग्रंथ है। स्वामी जी द्वारा प्रणीत यह महान ग्रंथ उनके द्वारा तीन हजार ग्रंथों के गहन अध्ययन और अड़तीस वर्षों के लम्बे चिंतन और अनुभव का सार है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ आर्यसमाज संस्था की रीढ़ है। आर्य समाजियों को स्वामी जी की इस पुस्तक पर गर्व है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का प्रथम संस्करण सितम्बर 1875 ई0 में तथा भाषा और व्याकरण आदि की ‘'शुद्धि और कुछ परिवर्धन के बाद द्वितीय संस्करण सन् 1882 ई0 में प्रकाशित किया गया। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में कुल चैदह समुल्लास हैं। इसकी मूल भाषा हिन्दी है।
महर्षि दयानंद ने वैदिक सिद्धांतों के प्रतिपादन हेतु इस महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की थी। इसके प्रथम संस्करण में केवल बारह समुल्लास थे। बाद के संस्करण में इसमें दो समुल्लास और जोड़ दिए गए। इस पुस्तक में सभी मत-मतांतरों की कटु और अपमानजनक ‘शब्दों में निंदा और आलोचना की गई है। बताया जाता है कि स्वामी दयानंद तर्कसंगत विचारों के पोषक थे। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को स्वामी जी के प्रगतिशील विचारों का संकलन बताया जाता है।
किसी भी पुस्तक की दो बड़ी खूबियां होती हैं। पहली यह कि उसकी भाषा-शैली सरल, सुबोध, शिष्ट, प्रवाहपूर्ण और भावात्मक हो। दूसरी यह कि उसमें प्रस्तुत तथ्य और विषय वस्तु तार्किक, बौद्धिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक हो। जहाँ तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का सवाल है, यह पुस्तक उक्त दोनों बिन्दुओं पर अत्यंत निम्न और घटिया है। मुझे तो संदेह होता है कि यह पुस्तक अपने मूल में भी है या नहीं? अगर यह पुस्तक आज अपने मूल में नहीं है तो फिर कोई सवाल पैदा नहीं होता। लेकिन अगर यह पुस्तक अपने मूल ही में है तो फिर यह सवाल पैदा होता है कि क्या यह पुस्तक किसी वेद विद्वान, व्याकरण के प्रकांड पंडित और आचार्य की कृति हो सकती है ?
भाषा शैली किसी लेखक की योग्यता और विद्वता की प्रमाण होती है। जिस व्यक्ति की विद्वता की धाक हो, जो एक संगठन का निर्माता आचार्य हो, क्या वह इतनी घिनौनी और ‘शर्मनाक भाषा का प्रयोग कभी कर सकता है ? जैसी भाषा शैली का प्रयोग अंतिम चार समुल्लासों में किया गया है। यहाँ उदाहरणार्थ कुछ अंश प्रस्तुत हैं ः-
‘देखो इन गवरगण्ड पोपो की लीला’,
’कथा का गपोड़ा भंग की लहरी में उड़ाया’,
‘महंत पुजारी पण्डे आँख के अंधे गांठ के पूरे’,
‘वाह रे वाह! भागवत के बनाने वाले लाल भुजक्कड़’,
‘गपोड़े का भाई गपोड़ा’,
‘क्या घूड़ अच्छे हैं’,
‘जैसा प्रेतनाथ वैसा भूतनाथ’,
‘ऐसी गपड़चैथ क्यों लिखता’,
‘कितनी पामरपन की बात है’,
‘यह बात बेर बेचने वाली कूंजड़ी के समान है’,
‘वाह रे वाह! विद्या के ‘शत्रुओं’,
‘वाह ईसाइयों के ईश्वर! क्या बड़ा डाक्तर है।‘,
‘ईसाइयों का ईश्वर अखाड़मल्ल है’,
‘अण्डवण्ड कथा गाई’, ‘यह ईश्वर क्या यह तो बड़ा खिलाड़ी है’,
‘अब देखिए! लम्बे चैड़े गपोड़े’, ‘यह देखो लड़केपन की बात’, ‘अब देखिए खुदा की अल्पज्ञता’, कुरआन का बनाने वाला निरक्षर भट्ट है’ ‘खुदा बड़ा गड़बड़िया है’, ‘खुदा ‘शैतानों का भी ‘शैतान है’, ‘खुदा झूठ का प्रवर्तक है’, ‘घसड़ पसड़’, ‘गड़ बड़ाध्याय’, ‘वाह जी वाह देखो जी! मुसलमानों का खुदा भानुमती के समान खेल रहा है’, ‘गवरगण्ड राजा के तुल्य’, ‘अंधेर नगरी गवरगण्ड राजा’, ‘गदर मचाने वाले खुदा और नबी’, ‘यह कुरआन का खुदा और नबी दोनों लड़ाईबाज़ थे’, ‘जिसका खुदा धोखेबाज उसके उपासक लोग धोखेबाज क्यों न हों ?’, ‘कुरआन किसी कपटी-छली का बनाया हुआ होगा’, ‘वाह जी वाह! कैसा खुदा और कैसे पैग़म्बर दयाहीन’, ‘खुदा क्या ठहरा मानो मुहम्मद साहेब के लिए बीवियां लाने वाला नाई ठहरा’, ‘वाह जी वाह! कुरआन के बनाने वाले फिलासफर!’।
यह तो थी ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की अशिष्ट, निकृष्ट और अहंकार पूर्ण भाषा शैली की एक झलक। अब ज़रा निम्न तथ्यों पर भी एक नज़र डालिए कि ये कितने ठोस, वैज्ञानिक और व्यावहारिक हैं ?
वेदों के ज्ञाता महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा हैः-
1. प्रसूता छह दिन के पश्चात् बच्चे को दूध न पिलावे।
(2-3) (4-68)
2. 24 वर्ष की स्त्री और 48 वर्ष के पुरुष का विवाह उत्तम है अर्थात् स्वामी जी के मतानुसार लड़के की उम्र लड़की से दूना या ढाई गुना होनी चाहिए।
(4-20) (14-143) (3-31)
3. गर्भ स्थिति का निश्चय हो जाने पर एक वर्ष तक स्त्री-पुरुष का समागम नहीं होना चाहिए। (2-2) (4-65)
4. जब पति अथवा स्त्री संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हों तो वह पुरुष अथवा स्त्री नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकते हैं।
(4-122 से 149)
5. यज्ञ और हवन करने से वातावरण ‘शुद्ध होता है। (4-93)
6. मांस खाना जघन्य अपराध है। मांसाहारियों के हाथ का खाने में आर्यों को भी यह पाप लगता है। पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानिएगा। (10-11 से 25)
7. मुर्दों को गाड़ना बुरा है क्योंकि वह सड़कर वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देते हैं। (13-41, 42)
8. लघुशंका के पश्चात् कुछ मुत्रांश कपड़ों में न लगे, इसलिए ख़तना कराना बुरा है। (13-31)
9. दण्ड का विधान ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधार पर होना चाहिए। (6-27)
10. ईश्वर के न्याय में क्षणमात्र भी विलम्ब नहीं होता। (14-105)
11. ईश्वर अपने भक्तों के पाप क्षमा नहीं करता। (7-52)
12. सूर्य केवल अपनी परिधि (Axis) पर घूमता है किसी लोक के चारों ओर (Orbit) नहीं घूमता। (8-71)
13. सूर्य, चन्द्र, तारे आदि पर भी मनुष्य आदि सृष्टि हैं। (8-73)
14. सिर के बाल रखने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम हो जाती है। (10-2)
जरा सोचिए ! क्या उक्त तथ्य वास्तव में बौद्धिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक हैं ?
वेदों के ज्ञाता स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों के निर्देशन में लिखा है ः-
1. ईश्वर जगत् का निमित्त (Efficient Cause) कारण है, उपादन कारण (Material Cause) नहीं है। (7-45) (8-3)

वैदिक धर्म एकेश्वरवाद का प्रतिपादन करता है और उसे सृष्टिकर्ता भी मानता है, मगर स्वामी दयानंद ने कहा कि उपादन कारण के बिना जगत् की उत्पत्ति संभव नहीं है। ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों अनादि हैं। ईश्वर मात्र शिल्पी है, उसने सृष्टि का विकास किया है, सृजन नहीं किया। अर्थात् जिस प्रकार कुम्भकार ने घड़ा बनाया, मिट्टी नहीं बनाई, ठीक इसी प्रकार परमेश्वर ने जगत् बनाया। प्रकृति और जीव दोनों संसाधन ;(Material) पहले से मौजूद थे।
2. सम्पूर्ण मानवता एक माँ-बाप की संतान नहीं है। (8-51)
3. वेद आवागमनीय पुनर्जन्म की अवधारणा का प्रतिपादन करते हैं। (9-75)
4. मनुष्य और पशु आदि में जीव (Soul) एक सा है। (9-74)
5. स्वर्ग, नरक का कोई अलग लोक नहीं है। (9-79)
विचार करें कि क्या वास्तव में वेद उक्त तथ्यों को प्रतिपादित करते हैं ?

किसी व्यक्ति ने स्वामी जी से सवाल किया कि मनुष्य की सृष्टि प्रथम हुई या पृथ्वी आदि की ? स्वामी जी ने जवाब दिया कि पृथ्वी आदि की, क्योंकि पृथ्वी आदि के बिना मनुष्य की स्थिति और पालन सम्भव नहीं हो सकता (8-50)।
किसी ने स्वामी जी से यह सवाल किया कि जगत् के बनाने में परमेश्वर का क्या प्रयोजन है ? उत्तर दिया गया कि नहीं बनाने में क्या प्रयोजन है ? (8-16)

एक अन्य प्रश्न-फल, मूल, कंद और रस इत्यादि अदृष्ट में दोष नहीं ?
उत्तर - अच्छा (जो अदृष्ट में दोष नहीं) तो भंगी व मुसलमान अपने हाथों से दूसरे स्थान में बनाकर तुम को आकर देवें तो खा लोगे या नहीं ? जो कहो कि नहीं तो अदृष्ट में भी दोष है। हाँ! मुसलमानों, ईसाई आदि मद्य-मांसाहारियों के हाथ के खाने में आर्याें को भी मद्य-मांसादि खाने-पीने का अपराध पीछे लग पड़ता है। (10-18)

किसी ने महर्षि से यह सवाल भी किया कि लोग गाय के गोबर से चैका लगाते हैं, अपने गोबर से क्यों नहीं लगाते ? महर्षि ने जवाब दिया कि गाय के गोबर में वैसा दुर्गन्ध नहीं होता जैसा मनुष्य के मल में होता है। (10-36)।


 जैन मतानुयायी ने सवाल किया कि देखो ! तुम लोग बिना उष्ण किए कच्चा पानी पीते हो, वह बड़ा पाप करते हो। जैसे हम उष्ण पानी पीते हैं, वैसे तुम लोग भी पिया करो। उत्तर में कहा गया कि यह बात तुम्हारी भ्रम जाल की है, क्योंकि जब तुम पानी को उष्ण करते हो तब पानी के जीव सब मरते होंगे और उनका ‘शरीर भी जल में रंधकर वह पानी सौंफ के अर्क तुल्य होने से जानों तुम उनके ‘शरीरों का ‘तेजाब’ पीते हो। इसमें तुम बड़े पापी हो और जो ठण्डा जल पीते हैं वे नहीं। (12-200)

एक मुस्लिम मतावलंबी ने कहा कि खुदा सर्वशक्तिमान है, वह जो चाहे कर सकता है। उत्तर में कहा गया कि क्या खुदा दूसरा खुदा भी बना सकता है ? अपने आप मर सकता है? मूर्ख, रोगी और अज्ञानी भी बन सकता है ? (14-28)


 स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं कि जब स्त्री और पुरुष का विवाह हो जाए तब से उनके खान-पान का उत्तम प्रबन्ध होना चाहिए कि जिससे उनका ‘शरीर जो पूर्व ब्रह्मचर्य और विद्याध्ययनरूप तपश्चर्या और कष्ट से दुर्बल होता है वह चन्द्रमा की कला के समान बढ़के थोड़े ही दिनों में पुष्ट हो जाए।

 पश्चात् जिस दिन कन्या रजस्वला होकर जब ‘शुद्ध हो तब वेदी और मण्डप रचके अनेक सुगन्धयादि द्रव्य और घृतादि का होम तथा अनेक विद्वान पुरुष और स्त्रियों का यथायोग्य सत्कार करें। पश्चात् जिस दिन ऋतुदान देना योग्य समझें उसी दिन ‘संस्कारविधि’ पुस्तकस्थ विधि के अनुसार सब कर्म करके मध्यरात्रि वा दश बजे अति प्रसन्नता से सब के सामने पाणिग्रहणपूर्वक विवाह की विधि को पूरा करके एकान्त सेवन करें।


 पुरुष वीर्यस्थापन और स्त्री वीर्याकर्षण की जो विधि है उसी के अनुसार दोनों करें। जहां तक बने वहां तक ब्रह्मचर्य के वीर्य को व्यर्थ न जाने दें, क्योंकि उस वीर्य वा रज से जो ‘शरीर उत्पन्न होता है वह अपूर्व उत्तम संतान होता है। जब वीर्य का गर्भाशय में गिरने का समय हो उस समय स्त्री और पुरुष दोनों स्थिर और नासिका के सामने नासिका, नेत्र के सामने नेत्र अर्थात् सूधा ‘ारीर और अत्यंत प्रसन्नचित रहें, डिगें नहीं। पुरुष अपने ‘ारीर को ढीला छोड़े और स्त्री वीर्यप्राप्ति-समय अपान वायु को ऊपर खींचे, योनि को ऊपर संकोच कर वीर्य का ऊपर आकर्षण करके गर्भाशय में स्थिर करें। पश्चात् दोनों ‘शुद्ध जल से स्नान करें।
गर्भस्थिति होने का परिज्ञान विदुषी स्त्री को तो उसी समय हो जाता है, परन्तु इसका निश्चय एक मास के पश्चात् रजस्वला न होने पर सब को हो जाता है। (4-63,64)
उपर्युक्त तथ्यों और विषय वस्तु को पढ़कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्या इस तरह की बातें एक विद्वान व्यक्ति और बाल ब्रह्मचारी द्वारा लिखी पुस्तक की विषय वस्तु हो सकती है ?

उक्त विषयों के अलावा यह बात भी संदेह उत्पन्न करती है कि स्वामी हिन्दी नहीं जानते थे। उन्होंने खुद ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के द्वितीय संस्करण की भूमिका में लिखा है कि ‘‘जिस समय मैंने यह ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ बनाया था, उस समय और उससे पूर्व संस्कृत भाषण करने, पठन-पाठन में संस्कृत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण मुझको इस भाषा का विशेष परिज्ञान नहीं था।’’ अतः यह स्पष्ट है कि स्वामी जी को हिन्दी का समुचित ज्ञान नहीं था। जिन दो भाषाओं का समुचित ज्ञान स्वामी जी को था, उनमें गुजराती क्षेत्रीय भाषा थी और संस्कृत आम बोलचाल की भाषा नहीं थी। यहाँ पर यह सवाल पैदा होता है कि स्वामी जी ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ लिखने से पहले जैन, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम आदि धर्माें की पुस्तकों का अध्ययन किया तो वह किस भाषा में किया ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि किसी भी नई भाषा को सीखने वाला व्यक्ति साहित्यिक दृष्टि से संभल कर बोलेगा और लिखेगा। ऐसा कभी नहीं होता कि नई भाषा सीखने वाला व्यक्ति पहले उस भाषा की गाली-गलौच और अशिष्ट ‘शब्द सीखता है।
यहाँ यह भी विचारणीय है कि यह कौन सी अक्लमंदी की बात है कि आदमी उस भाषा में पुस्तक लिखे, जिस भाषा का उसे समुचित ज्ञान न हो। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को गुजराती अथवा संस्कृत में लिखकर उसका हिन्दी रुपांतरण कराया जा सकता था।

किसी विद्वान और धार्मिक व्यक्ति की भाषा कभी मर्यादाहीन, अहंकारपूर्ण और विद्वेषपूर्ण नहीं होती। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि यह किसी ज्ञानवान और कुलीन व्यक्ति की लेखनी हो। 14वें समुल्लास को पढ़कर तो ऐसा लगता है कि जैसे यह किसी दुराग्रही, दंभी और अल्पज्ञ व्यक्ति की करतूत हो। मुझे तो ऐसा भी प्रतीत होता है कि कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा अंतरिम द्वेष और कुटिल भाव के कारण स्वामी जी की इस कृति के साथ छेड़छाड़ कर एक महान आत्मा के उद्देश्य और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कुचेष्टा की गई हो। मेरा यह दावा है कि जिस रूप में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ आज हमारे सम्मुख है, वह किसी प्रकांड पंडित और धर्मज्ञ की रचना नहीं हो सकती। एक कम अक़ल और गंवार व्यक्ति अशिष्ट और दंभपूर्ण भाषा ‘ौली का प्रयोग करें तो बात समझ में आती है, मगर एक आचार्य, संस्कृत का प्रकांड पंडित और वेदों का ज्ञाता अपने मुख्य ग्रंथ में ऐसी भाषा का प्रयोग करें तो इसे क्या कहा जाएगा ? संस्कृत एक अलौकिक, सभ्य और संस्कारित भाषा है, अगर एक संस्कृत और व्याकरण का प्रकांड पंडित अपने मुख्य ग्रंथ में निकृष्ट और अहंकार पूर्ण भाषा का प्रयोग करें तो क्या यह संस्कृत भाषा का अपमान नहीं हैं ?

नोटः कोष्ठक में प्रस्तुत संदर्भ की पहली संख्या समुल्लास को और दूसरी संख्या समुल्लासों में इंगित प्रश्न, उत्तर या समीक्षा क्रम संख्या को दर्शाती है।

Thursday, September 9, 2010

सत्‍यार्थ प्रकाश : समीक्षा की समीक्षा - निवेदन

ईशा वास्यमिदं सर्व यत्कित्र्चजगत्यां जगत्।’’ (यजु0, 40-1)

निवेदन
यह ब्रह्मांड जिसमें हम रहते हैं, अत्यंत विशाल, विस्तृत और अद्भुत है। इसकी विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारा सूर्य, जो हमारे सौरमंडल का मुखिया है, हमारी पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा और लगभग 15 करोड़ कि.मी. दूर है। हमारा यह सूर्य लगभग 9 लाख 60 हजार कि.मी. प्रति घंटा की गति से दौड़ रहा है। इस ब्रह्मांड में न जाने कितने आकाशीय पिंड हमारे सूर्य से लाखों गुना बड़े हैं और न जाने कितने सौरमंडल हैं। करोड़ों सौर मंडलों से बनने वाली एक आकाश गंगा ¼Galaxy½ है जिसमें अरबों-खरबों तारे-सितारे हैं। इस ब्रह्मांड में न जाने कितने करोड़ आकाशगंगाएं हैं। हमारा सूर्य जिस आकाश गंगा में स्थित है उसका केन्द्र सूर्य से लगभग 32000 प्रकाश वर्ष दूर है, जबकि एक प्रकाश वर्ष की लम्बाई 946 अरब कि.मी. है। हर आकाशीय पिंड गतिमान है। सूर्य, चांद, पृथ्वी, तारे सब गतिमान हैं। आकाशीय पिंडों की गति में एक नियमबद्धता है। दिन-रात के प्रत्यावर्तन में नियमबद्धता है। वनस्पति जगत में नियमबद्धता है। प्राणी जगत में नियमबद्धता है। कितना विचित्र है यह ब्रह्मांड! देखकर आश्चर्य होता है। प्रश्न यह है कि जहाँ नियम हो, क्या वहाँ नियामक नहीं होना चाहिए? जहाँ सुव्यवस्था हो, क्या वहाँ व्यवस्थापक नहीं होना चाहिए? ब्रह्मांड की नियमबद्धता इस बात का प्रमाण है कि कोई चेतन शक्ति इसका संचालन कर रही है। यहाँ की नियमबद्धता इस बात का भी प्रमाण है कि वह परम शक्ति एक है। चेतन शक्ति अगर एक से अधिक होती तो इतनी विचित्र और अद्भुत सुनियोजित और अनुशासनबद्धता न होती। इस अति विशाल ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी, जिसका व्यास 12754 कि.मी. और वजन 6x1024 कि.ग्राम है, का अस्तित्व बालू के एक कण से अधिक नहीं है। अब ज़रा सोचिए! इस ब्रह्मांड में हम मनुष्यों का अस्तित्व कितना होगा ? आखि़र हम को क्यों पैदा किया गया है ? क्या हम बिना किसी रचयिता के और बिना किसी उद्देश्य के इस ब्रह्मांड में आ गए हैं ? क्या हम पर कोई नियम-कानून लागू नहीं होता ?


यह सच है कि इस ब्रह्मांड का एक रचयिता है। वही हम सब का स्रष्टा, स्वामी, इष्ट और उपास्य है। परमेश्वर, अल्लाह, गॉड उसी एक परम चेतन शक्ति के नाम हैं। हम सब एक माँ-बाप की संतान हैं। हम सब भाई-भाई हैं। उस एक अति-प्राकृतिक सत्ता ने सृष्टि का सृजन एक महान उद्देश्य के लिए किया है। उस एक अदृश्य परम सत्ता ने अपना संदेश कुछ पवित्र आत्माओं और पुस्तकों द्वारा हम तक पहुंचाया है, वरना हमें कैसे पता चलता कि कोई अदृश्य परम सत्ता इस ब्रह्मांड का संचालन कर रही है। हम सब मनुष्यों का स्रष्टा एक है। इसीलिए हम सब मनुष्यों का जीवन लक्ष्य एक है। उस उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने का मार्ग एक है। उस मार्ग को धर्म कहते हैं। सब मनुष्यों का धर्म एक है। धर्म ईश्वरीय जीवन व्यवस्था का नाम है। यहाँ मनुष्यों में संघर्ष, टकराव और भेदभाव का मूल कारण सृष्टि और मानव जीवन के उद्देश्य को सच्चे अर्थों में न समझ पाना है।


 प्रस्तुत पुस्तक "सत्‍यार्थ प्रकाश : समीक्षा की समीक्षा" में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा प्रतिपादित मानव जीवन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण विषयों और धारणाओं को सादी और सरल भाषा में विज्ञान और विवेक की कसौटी पर कसने का प्रयास किया गया है, जिनका प्रतिपादन स्वामी जी ने अपने महान ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में किया है। यह मेरा संक्षिप्त विश्लेषण है। पाठकों से निवेदन है कि इसके विषयों को निष्पक्ष और स्वतंत्र भाव से पढ़ें और विचार करें कि जिन आस्थाओं और धारणाओं के आधार पर हम अपना जीवन गुज़ार रहे हैं, कहीं वे धारणाएं अतार्किक और अवैज्ञानिक तो नहीं हैं ? पूर्वाग्रह ने कहीं हमें विवेकहीन तो नहीं बना दिया है ? स्वयं को श्रेष्ठ और प्रबुद्ध और दूसरों को हीन और अल्पज्ञ समझने की दंभ पूर्ण और आग्रही वृत्ति ने कहीं हमें सच्चाई का विरोधी तो नहीं बना दिया है ? कहीं हम आत्म-मुग्धता और आत्म-तुष्टि में आत्मवंचना (Self Deception) का शिकार तो नहीं हो गए हैं ? यहाँ मेरा अभिप्राय मात्र इतना है कि हमारा चिंतन सकारात्मक, स्वस्थ और वैज्ञानिक हो, हमारी सोच विश्वस्तरीय हो, न कि क्षेत्रीय, हमारी आस्थाएं और धारणाएं युक्ति-युक्त और विशुद्ध हों, हम सत्यासत्य का निर्णय वाद-विवाद से नहीं बल्कि संवाद ¼Interaction½ से करें ताकि सांप्रदायिकता और दुराभाव की जगह समन्वय और सद्भाव का वातावरण विकसित हो। 


विषय
1.  प्राक्कथन  
2.  सत्यार्थ प्रकाशः भाषा, तथ्य और विषय वस्तु  
3.  नियोग और नारी  
4.  जीव हत्या और मांसाहार 
5.  अहिंसां परमो धर्मः ?  
6.  ‘शाकाहार का प्रोपगैंडा  
7.  मरणोत्तर जीवनः तथ्य और सत्य 
8.  दाह संस्कारः कितना उचित? 
9.  स्तनपानः कितना उपयोगी ? 
10. खतना और पेशाब  
11.  कुरआन पर आरोपः कितने स्तरीय ? 
12.  क़ाफ़िर और नास्तिक  
13.  क्या पर्दा नारी के हित में नहीं है ?  
14.  आक्षेप की गंदी मानसिकता से उबरें  
15.  मानव जीवन की विडंबना 
16.  हिंदू धर्मग्रंथों में पात्रों की उत्पत्ति ? 
17.  अंतिम प्रश्न  



Read online

http://www.4shared.com/document/cAx5Te1f/Satyarth_Book_10-august-10-aft.html?
There was an error in this gadget

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...