Friday, June 3, 2011

मांस भक्षण : आपत्ति और प्रतिक्रिया

पुस्तक में मांसाहार संबंधी विषय पर व्यापक आपत्तियां और प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं। लिखित रूप में मुझे किसी आलोचक का कोई पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। सभी आपत्तियां मौखिक रूप से बातचीत के दौरान और फोन पर की गई हैं। सभी आलोचकों ने एक ही बात कही है कि हिंदू शास्त्रों में कहीं भी जीव हत्या और मांस भक्षण का उल्लेख नहीं है। जीव हत्या और मांस भक्षण क्रूरता और जघन्य पाप है।
जिन लोगों ने हिंदू धर्म ग्रंथों का गंभीरता और गहनता के साथ अध्ययन किया है उन्हें यह बात आसानी से समझ में आ रही होगी कि मांस भक्षण के उक्त तथाकथित आलोचकों ने हिंदू शास्त्रों को पढ़ा तो क्या छुआ तक नहीं है। मांसाहार के अनेक हिंदू आलोचक मुझे ऐसे भी मिले हैं जो मांस भक्षण करते हैं, परंतु फिर भी मांसाहार का प्रबल विरोध करते हैं। इस तरह की मानसिकता के लोगों को क्या कहा जाएगा ?
उक्त विषय पर अनेक पढ़े-लिखे लोगों से मेरा विचार-विमर्श और चर्चा हुई है और होती रहती है, उनको मैंने हिंदू धर्म ग्रंथों वेद, रामायण, महाभारत, मनुस्मृति आदि में उल्लिखित मांस भक्षण से संबंधित मंत्रों और ‘लोकों को दिखाया तो उनमें से किसी का जवाब था कि किताबों में अर्थ का अनर्थ किया गया है। किसी ने मंत्र पढ़कर किताब को अलटा-पलटा और जवाब दिया कि हमारी इन किताबों में मुसलमानों ने गड़बड़ की है।
जिन लोगों से मेरी बातचीत हुई वे सभी उच्च शिक्षा प्राप्त (Well Educated) थे, मगर उनमें मुझे न कोई तर्क शक्ति (Reasoning Power) नज़र आई और न ही उनमें कोई विश्लेषण शक्ति (Analysis Power) मुझे दिखाई दी। जो लोग मांस खाते हैं और मांस भक्षण का विरोध करते हैं उनमें तर्क शक्ति (Logical Power) भला हो भी कैसे सकती है?

एक वाकिये का उल्लेख करना यहां प्रासंगिक (Relevant) होगा। सन् 2006 के उत्तर प्रदेश नगर निकाय चुनाव में मेरी डयूटी पोलिंग अधिकारी के रूप में लगी। जिस मतदान केन्द्र पर मेरी डयूटी थी उस केन्द्र पर दो पोलिंग पार्टियों में कुल मिलाकर 18 मतदान कर्मी थे। सभी कर्मी हिंदू थे। मतदान से पहले दिन हम लोग मतदान केन्द्र पर पहुंच गए। दोनों मतदान स्थल पर हिंदू मुस्लिम दोनों के मतदाताओं की संख्या लगभग आधी-आधी थी। शाम को सभी लोगों का खाना दोनों ही तरफ से लाया गया। किसी मतदान अधिकारी ने मुसलमान अभिकर्ता द्वारा खाने के विषय में पूछने पर उसे इशारा कर दिया था कि खाने में नानवेज बनवाए। एक तरफ से दाल-चावल, रोटी और दूसरी तरफ से नानवेज बनवाकर लाया गया। 18 लोगों में एक व्यक्ति ऐसा था जिसने दाल रोटी खायी। 17 लोगों ने दाल को हाथ तक नहीं लगाया। क्या उक्त वाकिये से यह साबित नहीं होता कि हम अंदर से कुछ और हैं और बाहर से कुछ और। यह भी मुमकिन है कि उक्त सभी लोग अपने समाज में शाकाहार के समर्थक और प्रचारक हों। क्या यही है हम और यही है हमारा चरित्र और आचरण ?

आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। दुनिया में कहां क्या हो रहा है यह भी हमारी आंखों के सामने है। आज किसे मालूम नहीं है कि आर्यों के इस देश भारत में हजारों मांस प्रसंस्करण ईकाइयां (डमंज च्तवबमेेपदह न्दपजे) काम कर रही हैं। किसे मालूम नहीं कि स्वामी दयानंद और स्वामी रामदेव के इस देश भारत में प्रतिदिन अरबों रुपयों का डिब्बा बंद मांस निर्यात होता है। किसे मालूम नहीं है कि शाकाहार वादियों (म्गजतमउपेजे टमहमजंतपंदपेउ) के इस देश भारत में मछली पालन और मुर्गी पालन को बढ़ावा देने के लिए हमारी सरकार अनुदान (ैनइेपकल) दे रही है। अगर मांस का उक्त कारोबार क्रूरता और पाप की पराकाष्ठा है तो हमारे धर्मगुरु क्यों चुप हैं?
कल तक हिंदू राष्ट्र कहे जाने वाले पड़ोसी देश नेपाल के विश्व प्रसिद्ध गढ़ी माई मंदिर में प्रतिवर्ष करीब 200000 (दो लाख) पशुओं की बलि दी जाती है। क्या यह वही नेपाल नहीं है जहां अहिंसा के संदेशवाहक गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था ?

नीचे हिंदू धर्मग्रंथों से मांस भक्षण संबंधी कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं। मांसाहार के आलोचक और विरोधी इन्हें गंभीरता से पढ़े। मुझे उम्मीद है कि प्रबुद्ध आलोचक इन उदाहरणों को पढ़कर अपनी आपत्तियों पर पुनर्विचार करेंगे और अवश्य किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचेंगे।


ऋग्वेद के निम्न मंत्र को देखिए-
उक्ष्णो   हि    मे   पंचदश   साकं   पचन्ति   विंशमित्।
उताहमद्मि पवि इदुभा कुक्षी पृणन्ति में विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः।।
(ऋग्वेद, 10-86-14)


भावार्थ - मेरे लिए इंद्राणी द्वारा प्रेरित यज्ञकर्ता लोग 15-20 बैल मार कर पकाते हैं, जिन्हें खाकर मैं मोटा होता हूँ। वे मेरी कुक्षियों को भी सोम रस से भरते हैं।
यजुर्वेद के एक मंत्र में पुरुषमेध का प्राचीन इतिहास इस तरह प्रस्तुत किया गया है।
देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽ अवध्नन् पुरुषं पशुम।
(यजुर्वेद, 31-15)


भावार्थ - इंद्र आदि देवताओं ने पुरुषमेध किया और पुरुष नामक पशु का वध किया।
अथर्ववेद में स्पष्ट ‘ाब्दों में पांच प्राणियों को देवता के लिए बलि दिए जाने योग्य कहा है -
तवेमे पंच पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः।
(अथर्ववेद, 11-29-2)
भावार्थ - हे पशुपति देवता, तेरे लिए गाय, घोड़ा, पुरुष, बकरी और भेड़ ये पांच पशु नियत हैं।


मनुस्मृति जो स्वामी दयानंद के चिंतन का मुख्य आधार रही है उसमें न केवल मांस भक्षण का उल्लेख और संकेत है, बल्कि मांस भक्षण की स्पष्ट अनुमति दी गई है। मनुस्मृति में मांस भक्षण की अनुमति के साथ मांस भक्षण की उपयोगिता और महत्व भी बताया गया है -
यज्ञे वधोऽवधः।
(मनु0, 5-39)
भावार्थ - यज्ञ में किया गया वध, वध नहीं होता।


या वेदविहिता हिंसा नियतास्ंिमश्चराचरे।
अहिंसामेव तां विद्याद्वेदाद्धर्मो हि निर्बभौ।।
(मनु0, 5-44)
भावार्थ - जिस हिंसा का वेदों में विधान किया गया है, वह हिंसा न होकर अहिंसा ही है, क्योंकि हिंसा, अहिंसा का निर्णय वेद करता है।


एष्वर्थेषु पशून्हिसन्वेदतत्त्वार्थविद्द्विजः।
आत्मानं च पशुं चैव गमयत्युत्तमां गतिम्।।
(मनु0, 5-42)
भावार्थ - वेद-कर्मज्ञ द्विज यज्ञ-कर्म में पशु वध करता है तो वह पशु-सहित उत्तम गति को प्राप्त करता है।

उष्ट्रवर्जिता एकतो दतो गोऽव्यजमृगा भक्ष्याः।
(मनु0, 5-18)
भावार्थ- ऊंट को छोड़कर एक ओर दांतवालों में गाय, भेड़, बकरी और मृग भक्ष्य अर्थात् खाने योग्य हैं।

‘वभिर्हतस्य यन्मांसं ‘ाुचि तन्मनुरब्रवीत।
क्रव्याöिश्च हतस्यान्यैश्चाण्डालाद्यैश्च दस्युभिः।।
(मनु0, 5-134)
भावार्थ- मनु के अनुसार, कुत्तों द्वारा पकड़े गए मृग, ‘ोरों द्वारा खाया गया कच्चा मांस, चांडाल व चोरों द्वारा मारे गए मृग का मांस शुद्ध है।

दौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु।
औरभ्रेणाथ चतुरः ‘ााकुनेनाथ पत्र्च वै।।
(मनु0, 3-269)
भावार्थ- विधि-विधान के द्वारा प्रदत्त मछली के मांस से मानव-पितर दो महीने तक, मृग के मांस से तीन महीने तक, भेड़ के मांस से चार महीने तक, पक्षियों के मांस से पांच महीने तक तृप्त संतुष्ट होते हैं।
“ाण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै।
अष्टावैणेस्यमांसेन रौरवेण नवैव तु।।
(मनु0, 3-270)
भावार्थ- बकरे, चित्रमृग, भेड़ व रूरूमृग के मांस से क्रमशः सात, आठ और नौ महीने तक मानव-पितर तृप्त-संतुष्ट रहते हैं।

दशामासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः।
‘ाशकूर्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु।।
(मनु0, 3-271)
भावार्थ- सूअर और भैंस के मांस से मानव-पितर दस महीने तक संतृप्त रहते हैं और खरगोश व कछुए के मांस से ग्यारह महीने तक।


महाभारत में आया है -
गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोच्येत।
(अनुशासन पर्व, 88-5)
भावार्थ- गौ के मांस से श्राद्ध करने पर पितरों की एक साल के लिए तृप्ति होती है।
महाभारत में रंतिदेव नामक एक राजा का वर्णन मिलता है जो गोमांस परोसने के कारण यशस्वी बना। महाभारत, वन पर्व में आता है -
राज्ञो महानसे पूर्व रन्तिदेवस्य वै द्विज,
द्वे सहस्रे तु वध्येते पशूनामन्वहं तदा,
अहन्यहनि वध्येते द्वे सहस्रे गवां तथा,
समांसं ददतो ह्यन्नं रन्तिदेवस्य नित्यशः,
अतुला कीर्तिरभवन्नृपस्य द्विजसत्तम,
(वनपर्व 208-8,10)
भावार्थ- राजा रंतिदेव की रसोई के लिए दो हजार पशु काटे जाते थे। प्रतिदिन दो हजार गाय काटी जाती थी। मांस सहित अन्न का दान करने के कारण राजा रंतिदेव की अतुलनीय कीर्ति हुई।


उक्त से कमअक़्ल व्यक्ति भी समझ सकता है कि महाभारत काल में गोवध और गोमांस भक्षण सराहनीय कार्य था न कि निंदनीय।
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में भी मांस भक्षण का स्पष्ट उल्लेख है। निम्न ‘लोक देखिए-
जब भरत सेना सहित भरद्वाज मुनि के आश्रम में जाते हैं तो भरद्वाज मुनि के आश्रम में भरत का सेना सहित मृग, मोर और मुर्गों के मांस से स्वागत सत्कार होता है।
वाप्यो मैरेयपूर्णाश्च मृष्टमांसचयैर्वृताः।
प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूरकौक्कुटैः।।
(अयोध्या कांड, 91-70)
भावार्थ - भरत की सेना में आये हुए निषाद आदि निम्न वर्गों के लोगों की तृप्ति के लिए वहां मधु से भरी हुई बावड़ियां प्रकट हो गई थी तथा उनके तटोंपर तपे हुए पिठर (कुण्ड) में पकाये हुए मृग, मोर और मुर्गाें के स्वच्छ मांस भी ढेर के ढेर रख दिये गये थे। जब रावण सीता के हरण की नीयत से साधु का वेष बनाकर वन में सीता के पास जाता है तो सीता अपना परिचय देते हुए रावण से राम के विषय में बतलाती है-
रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वाऽ ऽदायामिषं बहु।।
स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वतः।।
एकश्च दण्डकारण्ये किमर्थ चरसि द्विज।।
(अरण्यकांड, 47-23, 24)
भावार्थ- ‘रुरू, गोह और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओं का वध करके तपस्वी जनों के उपभोग में आने योग्य बहुत सा फल-मूल लेकर वे अभी आयेंगे। (उस समय आपका विशेष सत्कार होगा)। ब्रहान्! अब आप भी अपने नाम गोत्र और कुल का ठीक-ठीक परिचय दीजिए। आप अकेले इस दण्डकारण्य में किस लिये विचरते हैं ?
श्री राम जब गंगा पार करके समृद्धिशाली वत्स देश (प्रयाग) में पहुंचे तो वहां लक्ष्मण सहित दोनों भाइयों ने चार महामृगों का शिकार किया।

तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान्
वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम्।
आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ
वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम्।।
(अयोध्याकांड, 52-102)
भावार्थ- वहां उन  दोनों भाइयों ने मृगया विनोद के लिए वराह, ऋश्य, पृषत् और महारुरु- इन चार महामृगों पर बाणों का प्रहार किया। तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कंद-मूल आदि लेकर सायंकाल के समय ठहरने के लिए (सीताजी के साथ) एक वृक्ष के नीचे चले गये।


स्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का भी एक दोहा देखिए-
बंधु  सखा  संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।।
पावन मृग मारहिं जियं जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी।
(बालकांड, 204-1)
भावार्थ- श्रीराम चन्द्र जी भाइयों और इष्ट-मित्रों को बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वन में जाकर शिकार खेलते हैं। मन में पवित्र समझकर मृगों को मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा (दशरथ जी) को दिखलाते हैं।


श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में राजा दशरथ द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ का वर्णन मिलता है। बाल कांड में आता है कि राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी। पुत्रोत्पत्ति की लालसा से राजा दशरथ ने सरयू नदी के उत्तर तट पर यज्ञ भूमि का निर्माण कर शास्त्रोक्त रीति से यज्ञ किया।
देखिए अयोध्या राजा दशरथ द्वारा किया गया अश्व-
मेध नामक महायज्ञ किस प्रकार संपन्न हुआ।
अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन् प्राप्ते तुरंगमे ।
सरय्वाश्रचोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोडभ्यवर्तत ।।
ऋष्यश्रृंग पुरस्कृत्य कर्म चक्रुद्र्विजर्षभाः ।
अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोडस्य सुमहात्मनः ।।
नियुक्तास्तत्रः पशवस्तत्तदुद्दिश्य दैवतम्।
उरगाः पक्षिणश्चैव यथाशास्त्रं प्रचोदिताः।।
‘ाामित्रे तृ हयस्तत्र तथा जलचराश्च ये।
ऋषिभिः सर्वमेवैतन्नियुक्तं ‘ाास्त्रतस्तदा।।
पशुनां त्रिशतं तत्र यूपेषु नियतं तदा ।
अश्वरत्नोत्तमं तत्र राज्ञो दशरथस्य ह।।
कौसल्या तं हयं तत्र परिचय समन्ततः ।
कृपाणैर्विससारैनं त्रिभिः परमया मुदा ।।
पतत्त्रिणा तदा सार्धे सुस्थितेन च चेतसा ।
अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया।।
होताध्वर्युस्तथोदाता हस्तेन समयोजयन ।
महिष्या परिवृत्त्याथ वावातामपरां तथा ।।
पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रियः ।
ऋत्विक्परमसम्पन्नः श्रपयामास ‘ाास्त्रतः।।
धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः।
यथाकालं यथान्यायं निर्णुदन् पापमात्मनः।।
हयस्य यानि चांगनि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः
अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समस्ताः“ाोडशत्र्विजः

इधर वर्ष पूरा होने पर यज्ञ सम्बन्धी अश्व भूमण्डल में भ्रमण करके लौट आया। फिर सरयू नदी के उत्तर तट पर राजा का यज्ञ आरम्भ हुआ।
महामनस्वी राजा दशरथ के उस अश्वमेध नामक महायज्ञ में ़ऋष्य श्रृंग को आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञ सम्बन्धी कार्य करने लगे।
वहाँ पूर्वोक्त यूपों में शास्त्र विहित पशु, सर्प और पक्षी विभिन्न देवताओं के उद्देश्य से बाँधे गये थे ।
‘ाामित्र कर्म में यज्ञिय अश्व तथा कूर्म आदि जलचर जन्तु जो वहाँ लाये गये थे, ऋषियों ने उन सबको शास्त्र विधि के अनुसार पूर्वोक्त यूपों में बाँध दिया।
उस समय उन यूपों में तीन सौ पशु बँधे हुए थे तथा राजा दशरथ का वह उत्तम अश्वरत्न भी वहीं बाँधा गया था।
रानी कौसल्या ने वहाँ प्रोक्षण आदि के द्वारा सब ओर से उस अश्वका संस्कार करके बड़ी प्रसन्नता के साथ तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया।
तद्नन्तर कौसल्या देवी ने सुस्थिर चित्त से धर्मपालन की इच्छा रखकर उस अश्व के निकट एक रात निवास किया।
तत्पश्चात् होता, अध्वर्यु और उदªाता ने राजा की (क्षत्रिय जातीय) महिषी ‘कौसल्या’, (वैश्य जातीय स्त्री) ‘वावाता’ तथा (शूद्र जातीय स्त्री) ‘परिवृत्ति’- इन सबके हाथ से उस अश्व का स्पर्श कराया।
इसके बाद परम चतुर जितेन्द्रिय ऋत्विक् ने विधि पूर्वक अश्वकन्द के गूदे को निकालकर शास्त्रोक्त रीति से पकाया।
तत्पश्चात् उस गूदे की आहुति दी गयी। राजा दशरथ ने अपने पाप को दूर करनेे के लिये ठीक समय पर आकर विधि पूर्वक उसके धुएँ की गन्ध को सूँघा।
उस अश्वमेध यज्ञ के अंग्भूत जो-जो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको लेकर समस्त सोलह ऋृत्विज ब्राह्मण अग्नि में विधिवत् आहुति देने लगे।
   (बालकांड, 14-1,2,30-38)


ऊपर जो लिखा गया है वह तो अति संक्षेप में है, वरना हिंदू धर्मग्रंथों में इस विषय पर अभी और बहुत कुछ है। आलेख अधिक लम्बा न हो इसलिए कुछ ग्रंथों जैसे उपनिषद् और चरक संहिता आदि को छोड़ दिया गया है। जो लोग कहते हैं कि हिंदू धर्म ग्रंथों में ऊपर जो लिखा गया है वह तो अति संक्षेप में है, वरना हिंदू धर्मग्रंथों में इस विषय पर अभी और बहुत कुछ है। आलेख अधिक लम्बा न हो इसलिए कुछ ग्रंथों जैसे उपनिषद् और चरक संहिता आदि को छोड़ दिया गया है। जो लोग कहते हैं कि हिंदू धर्म ग्रंथों में पशुबलि, जीव हत्या और मांस भक्षण का कहीं कोई उल्लेख नहीं है वे लोग अपने धर्मग्रंथों से क़तई अनभिज्ञ हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि आर्य मांस प्रेमी थे, यज्ञों में पशु बलि को वे बहुत अधिक पुण्य का कार्य समझते थे। अतः यह सत्य है कि मांस भक्षण विज्ञान सम्मत तो है ही, धर्मशास्त्र सम्मत भी है।


अगर हम अंधविश्वास और रुढ़िवादिता को छोड़कर उक्त वैज्ञानिक सत्य को स्वीकार कर लें तो ऐसा करने से हमारी कौन सी नाक कट जाएगी? एक वैज्ञानिक सत्य को अपनाने से हम कौन सा असभ्य और अनैतिक साबित हो जाएंगे? एक वैज्ञानिक सत्य को मानने से हम कौन सा कमजोर और बुद्धिहीन समझे जाएंगे?

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